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title: "Bhagavad Gita 3.24 — Karma Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:01:43.432Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/3/24"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 3.24
> Chapter 3 — Karma Yoga (Karm Yog), Verse 24.

## Sanskrit
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।

सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।3.24।।
 

## Transliteration
utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham
sankarasya cha kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ


## Word Meanings
utsīdeyuḥ—would perish; ime—all these; lokāḥ—worlds; na—not; kuryām—I perform; karma—prescribed duties; chet—if; aham—I; sankarasya—of uncultured population; cha—and; kartā—responsible; syām—would be; upahanyām—would destroy; imāḥ—all these; prajāḥ—living entities


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।3.23 -- 3.24।।  हे पार्थ ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्य-कर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला  तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
 
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।3.24।। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे; और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन करने वाला होऊँगा।।
 
### Swami Adidevananda (english)
If I do not do the work, these people will be lost; and I will be causing chaos in life and thereby ruining all these people.
### Swami Gambirananda (english)
These worlds would be ruined if I did not perform action. And I shall become the agent of intermingling (of castes), and shall be destroying these beings.
### Swami Sivananda (english)
These worlds would perish if I did not perform action; I would be the author of confusion of castes and destruction of these beings.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
These worlds would perish if I were not to perform action; and I would be the cause of confusion; I would destroy these people.
### Shri Purohit Swami (english)
And if I were to refrain from action, the human race would be ruined; I would lead the world to chaos, and destruction would follow.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
উত্সীদেযুরিমে লোকা ন কুর্যাং কর্ম চেদহম্৷
সঙ্করস্য চ কর্তা স্যামুপহন্যামিমাঃ প্রজাঃ৷৷3.24৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
যদি আমি কর্ম না করি এই সমস্ত লোক পথভ্রষ্ট হবে, বর্ণসংকরাদির কর্তা হব এবং এই সমস্ত প্রজা ধ্বংশ হবে।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
 3.24।। व्याख्या-- [बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वय-रीतिसे कर्तव्य-पालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेक-रीतिसे कर्तव्य-पालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।]यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पूर्वश्लोकमें आये 'वर्त एव च कर्मणि' पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ 'हि'पद आया है।भगवान् कहते हैं कि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ--ऐसा हो ही नहीं सकता; परन्तु यदि ऐसा मान लें' कि मैं कर्म न करूँ-- इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ 'यदि जातु' पदोंका प्रयोग किया है।'अतन्द्रितः' पदका तात्पर्य यह है कि कर्तव्य-कर्म करनेमें आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये, अपितु उन्हें बहुत सावधानी और तत्परतासे करना चाहिये। सावधानी-पूर्वक कर्तव्य-कर्म न करनेसे मनुष्य आलस्य और प्रमादके वशमें होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देता है।कर्मोंमें शिथिलता (आलस्य-प्रमाद) न लाकर उन्हें सावधानी एवं तत्परतापूर्वक करनेसे ही कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है। जैसे वृक्षकी कड़ी टहनी जल्दी टूट जाती है, पर जो अधूरी टूटनेके कारण लटक रही है, ऐसी शिथिल (ढीली) टहनी जल्दी नहीं टूटती, ऐसे ही सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, पर आलस्य-प्रमादपूर्वक (शिथिलतापूर्वक) कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होता। इसीलिये भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें 'समाचर' पदका तथा इस श्लोकमें'अतन्द्रितः' पदका प्रयोग किया है।अगर किसी कर्मकी बार-बार याद आती है, तो यही समझना चाहिये कि कर्म करनेमें कोई त्रुटि (कामना, आसक्ति, अपूर्णता, आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा आदि) हुई है, जिसके कारण उस कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ है। कर्मसे सम्बन्ध-विच्छेद न होनेके कारण ही किये गये कर्मकी याद आती है।'मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः' इन पदोंसे भगवान् मानो यह कहते हैं कि मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले ही वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। जो मुझे आदर्श न मानकर आलस्य-प्रमादवश कर्तव्य-कर्म नहीं करते और अधिकार चाहते हैं, वे आकृतिसे मनुष्य होनेपर भी वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं।इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि श्रेष्ठ पुरुषके आचरण और प्रमाणके अनुसार सब मनुष्य उनका अनुसरण करते हैं और इस श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुसरण करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठ पुरुष तो एक ही लोक-(मनुष्यलोक-) में आदर्श पुरुष हैं पर मैं तीनों ही लोकोंमें आदर्श पुरुष हूँ।मनुष्यको संसारमें कैसे रहना चाहिये-- यह बतानेके लिये भगवान् मनुष्यलोकमें अवतरित होते हैं। संसारमें अपने लिये रहना ही नहीं है--यही संसारमें रहनेकी विद्या है। संसार वस्तुतः एक विद्यालय है, जहाँ हमें कामना, ममता, स्वार्थ आदिके त्यागपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करना सीखना है और उसके अनुसार कर्म करके अपना उद्धार करना है। संसारके सभी सम्बन्धी एकदूसरेकी सेवा (हित) करनेके लिये ही हैं।इसीलिये पिता पुत्र पति पत्नी भाई बहन आदि सबको चाहिये कि वे एकदूसरेके अधिकारकी रक्षा करते हुए अपनेअपने कर्तव्य पालन करें और एक-दूसरेके कल्याणकी चेष्टा करें।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।3.24।। ईश्वर के रूप में यदि मैं शासन न करूँ तो विश्व में उन्नति नहीं होगी और नियमबद्ध सृष्टि भी नष्ट हो जायेगी। विश्व कोई क्रमहीन रचना नहीं वरन् नियमबद्ध सृष्टि है। प्रकृति के नियम पालन में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन होता नहीं दिखाई देता।प्राकृतिक घटनायेंे ग्रहों की गति ऋतुओं का लयबद्ध नृत्य और सृष्टि का संगीत  ये सब किसी महान् नियम के अनुसार चलते रहते हैं इसी को कहतेैं हैं प्रकृति और उसके नियामक ईश्वर की प्रबल शक्ति। इस ईश्वररूप में भगवान् के निष्क्रिय हो जाने पर ये लोक नष्ट हो जायेंगे। श्रीकृष्ण का यह कथन तर्क के विपरीत नहीं है जो केवल अन्धविश्वासी लोगों को ही स्वीकार होगा। विज्ञान की दृष्टि से विचार करने वाले लोग भी इसको अस्वीकार नहीं कर सकते।भगवान् केवल बाह्य जगत् के पदार्थों का संचालन करने वाले नियमों के ही नियामक नहीं बल्कि भावना एवं विचार के आन्तरिक जगत् के भी नियन्ता हैं। हिन्दू ऋषिमुनियों ने मानव समाज का चार वर्णों में जो वर्गीकरण किया उसका आधार मनुष्य का मानसिक स्वभाव एवं बौद्धिक क्षमता थी। यदि आन्तरिक जगत् में कोई नियम सुचारु रूप से काम न करें तो मनुष्य के व्यवहार और चरित्र में विचित्रता और अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे भ्रांति की वृद्धि होगी। वर्तमान में प्रचलित वर्णसंकर का अर्थ शास्त्र के विपरीत है जिसके कारण आज का शिक्षित व्यक्ति गीता की आलोचना करते हुये कह सकता है कि इसमें उच्च वर्ण की वर्चस्वता को ही भगवान की स्वीकृत है। वर्ण संकर के विषय में प्रथम अध्याय के 41वें श्लोक में विवेचन किया जा चुका है।आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर स्वयं को कर्म से कोई प्रयोजन न होने पर भी ज्ञानी पुरुष को कर्म करना चाहिये। कैसे 
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।3.24।।श्रेष्ठस्य तव मार्गानुवर्तित्वं मनुष्याणामुचितमेवेत्याशङ्क्य दूषयति  तथाचेत्यादिना। ईश्वरस्य कर्मण्यप्रवृत्तौ तदनुवर्तिनामपि कर्मानुपपत्तेरिति हेतुमाह  लोकस्थितीति। इतश्चेश्वरेण कर्म कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। यदि कर्म न कुर्यामिति शेषः। संकरकरणस्य कार्यं कथयति  तेनेति। प्रजोपहतिः परिप्राप्यते चेत् किं तया तव स्यादिति तत्राह  प्रजानामिति। त्वामनाचरन्तमनुवर्ततां सर्वेषां को दोषः स्यादित्यपेक्षायामीश्वरस्य कृतार्थतया कर्मानुष्ठानाभावे तदनुवर्तिनामपि तदभावादेव स्थितिहेत्वभावात्पृथिव्यादिभूतानां विनाशप्रसङ्गाद्वर्णाश्रमधर्मव्यवस्थानुपपत्तेश्चाधिकृतानां प्राणभृतां पापोपहतत्वप्रसङ्गात्परानुग्रहार्थं प्रवृत्तिरीश्वरस्येत्युक्तं संप्रति लोकसंग्रहाय कर्म कुर्वाणस्य कर्तृत्वाभिमानेन ज्ञानाभिभवे प्राप्ते प्रत्याह  यदि पुनरिति। कृतार्थबुद्धित्वे हेतुमाह  आत्मविदिति। यथावदात्मानमवगच्छत्कर्तृत्वाद्यभिमानाभावात्कृतार्थो भवत्येवेत्यर्थः। अर्जुनादन्यत्रापि ज्ञानवति कृतार्थबुद्धित्वं कर्तव्यत्वाद्यभिमानहीने तुल्यमित्याह  अन्यो वेति। तस्य तर्हि कर्मानुष्ठानमफलत्वादनवकाशमित्याशङ्क्याह  तस्यापीति। कर्तव्य इत्यात्मविदापि परानुग्रहाय कर्तव्यमेव कर्मेत्याहेति शेषः।
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।3.24।। तथाच को दोष इत्यत आह  उत्सीदेयुरिति। अहं चेत्कर्म न कुर्यां तर्हि इमें लोकाः उत्सीदेयुर्नश्येयुः लोकानुच्छित्तिनिमित्तकर्मणोऽभावात्। संकरस्य च कर्ता स्यां तेनेमाः प्रजाः उपहन्यामतः प्रजानामनुग्रहाय प्रवृत्तस्य ममेदं नानुरुपमित्यर्थः। युत्तु यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना  न केवलं लोकसंग्रहं पश्यन्कर्तुमर्हस्यपि तु श्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह  यद्यदिति। तथाच मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयो न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थत्यादिभिस्त्रिभिस्तत्प्रदर्शनमिति केषांचिद्य्वाख्यानं तद्भाष्यानुगुण्येन योजनीयम्। यद्वा लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसीति पूर्वोक्तानुरोधेन लोकसंग्रहं कः कर्तुमिच्छति कथंचेत्युच्यते। यद्यदित्यस्य भाष्योक्तोत्थापनविरुद्धं न केवलमित्याद्युपेक्ष्यम्। कर्मणैवेत्यादिना शिष्टाचारस्योक्तत्वात् सक्ता इत्यादिना विदुषो लोकसंग्रहाय कर्मणि प्रवृत्तिं दर्शयता यदि त्वमात्मानं विद्वांसं मन्यसे तर्हि लोकसंग्रहं संप्रति पश्यन्कर्मकर्तुमर्हसीत्येवं दृढीकृतं तस्मान्मध्येऽपि स्वस्य श्रेष्ठस्य कर्मणि प्रवृत्तिं प्रत्यक्षसिद्धां दर्शयंस्तदेव द्रढयति। योजनान्तरानीतार्थस्त्वर्थात्संबोधनाद्वापि सिध्यतीति न तदर्था भाष्यविरुद्दा क्लिष्टयोजना प्रदर्शनीयेति दिक्।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।3.24।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।3.24।।ततश्च किमित्यत आह  उत्सीदेयुरिति। यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना। न केवलं लोकसंग्रहंपश्यन् कर्तुमर्हसि अपितु श्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह  यद्यदिति। तथा च मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयः न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो यो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थेत्यादिभिस्त्रिभिः श्लोकैस्तत्प्रदर्शनमिति मधुसूदनश्रीपादाः।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।3.24।।अहं कुलोचितं कर्म न चेत् कुर्याम् एवम् एव सर्वे शिष्टलोका मदाचारायत्तधर्मनिश्चया अकरणाद् एव उत्सीदेयुः  नष्टा भवेयुः शास्त्रीयाचाराणाम् अपालनात् सर्वेषां शिष्टकुलानां संकरस्य च कर्ता स्याम् अता एव इमाः प्रजा उपहन्याम्। एवम् एव त्वम् अपि शिष्टजनाग्रेसरपाण्डुतनयः युधिष्ठिरानुजः अर्जुनः सन् शिष्टतया यदि ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकरोषि ततः त्वदाचारानुवर्तिनः अकृत्स्नविदः शिष्टाः च मुमुक्षवः स्वाधिकारम् अजानन्तः कर्मनिष्ठायाम् अनधिकुर्वन्तो विनश्येयुः अतो व्यपदेश्येन विदुषा कर्म एव कर्तव्यम्।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
।।3.24।।ततः किमत आह  उत्सीदेयुरिति। उत्सीदेयुः कर्मलोपेन नश्येयुः। ततश्च वर्णसंकरो भवेत्तस्याप्यहमेव कर्ता स्यां भवेयम्। एवमहमेव प्रजा उपहन्यां मलिनीकुर्याम्।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
।।3.24।।शास्त्रमेवानुसृत्य तवाकरणं नाद्रियेरन्नित्यत्राह  उत्सीदेयुरिति। लोकशब्दस्याचारपरजनविषयतामौचित्यसिद्धामभिप्रेत्योक्तंशिष्टलोका इति।इमे इतीदंशब्दबहुवचनयोः सामर्थ्यात्  सर्व इत्युक्तम्। सर्वेषां शास्त्रार्थानां सर्वैर्निश्चेतुमशक्यत्वाच्छिष्टाचारदत्तदृष्टीनामुक्ताया अनुवृत्तेः प्रकारमालोच्योक्तंमदाचारेत्यादि। विशरणाद्यर्थासम्भवात्पुरुषार्थहानापुरुषार्थप्राप्तिरूपो नाश इहोत्साद इत्याह  नष्टा भवेयुरिति।असन्नेव तै.आ.6 इत्यादिवदेतत्। अकरणस्योत्सादहेतुत्वेऽवान्तरव्यापारः सङ्करः स च ब्राह्मणादिधर्मस्य युद्धनिवृत्त्यादेः क्षत्ित्रयादिभिरनुष्ठानम्। उपहतिः पश्चादपि कर्मानर्हता। स्वात्मनि दृष्टान्तभूते दर्शितमर्थं दार्ष्टान्तिकेऽभिप्रेतं व्यञ्जयति  एवमेव त्वमिति।न मे पार्थास्ति 3।22 इति पार्थशब्दसम्बुद्ध्यभिप्रेतमनुविधेयत्वोपयोग्याकारत्रयमाहशिष्टेति। युधिष्ठिरशब्दोपादानं युद्धप्रोत्साहनाय रणयज्ञाख्यक्षत्रेधर्मनिष्ठताद्योतनार्थम् किं तव पित्रादिप्रतिसम्बन्ध्यन्तरेण स्वयमेव हि शिष्टजनाग्रेसरतयोर्वशीविराटतनयादिवृत्तान्तैः प्रसिद्धस्त्वमित्यभिप्रायेणाह  अर्जुनः सन्निति। धर्मो हि शिष्टेनानुष्ठेयः ज्ञानयोगश्च परमधर्मः ततश्च तदनुवर्तनं लोकस्य मोक्षायैव स्यादिति लोकरक्षैव भवेदिति शङ्कायामुक्तंस्वाधिकारमजानन्त इति। तदनधिकारिणां तत्रानुप्रवेशेनोभयभ्रष्टता स्यादिति भावः।लोकसङग्रहं 3।20 इत्यादिनोक्तमुपसंहरति  अत इति।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।3.23  3.25।।यदीत्यादि लोकसंग्रहमित्यन्तम्।  किं च विदितवेद्यः कर्म चेत् त्यजेत् तत् लोकानां दुर्भेद एव एकप्रसिद्धपक्षशिथिलितास्थाबन्धत्वेनाप्ररूढिलक्षणो जायेत (S  K जायते)।  यतः (S omits यतः) कर्मवासनां च न मोक्तुं शक्नुवन्ति ज्ञानधारां च नाश्रयितुम् अथ च शिथिलीभवन्ति।
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।3.24।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।3.24।।श्रेष्ठस्य तव मार्गानुवर्तित्वं मनुष्याणामुचितमेव अनुवर्तित्वे को दोष इत्यत आह  अहमीश्वश्चेद्यदि कर्म न कुर्यां तदा मदनुवर्तिनां मन्वादीनामपि कर्मानुपपत्तेर्लोकस्थितिहेतोः कर्मणो लोपेनेमे सर्वे लोका उत्सीदेयुर्विनश्येयुः। ततश्च वर्णसंकरस्य च कर्ताहमेव स्याम् तेन चेमाः सर्वाः प्रजा अहमेवोपहन्यां धर्मलोपेन विनाशयेयम्. कथंच प्रजानामनुग्रहार्थं प्रवृत्त ईश्वरोऽहं ताः सर्वा  विनाशयेयमित्यभिप्रायः। यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना  न केवलं लोकसंग्रहं पश्यन्कर्तुमर्हस्यपितुश्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह  यद्यदिति। तथाच मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयो न स्वातन्त्र्येणान्य  इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो यो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थेत्यादिभिस्त्रिभिः श्लोकैस्तत्प्रदर्शनमिति।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।3.24।।ननु तथा तत्करणं किं प्रयोजनकं इत्यत आह  उत्सीदेयुरिति। अहं चेत्कर्म न कुर्यां तदा इमे लोका उत्सीदेयुः। अत्रायं भावः  सर्वेषां भक्तिप्रवृत्तौ सत्यां भगवत्साक्षात्कारो मुक्तिर्वा स्यात्तदा इमे मन्वादयो लोकाः सृष्ट्यभावादुच्छिन्ना भवेयुः। अत एव भगवता वृषभध्वजे आज्ञप्तं पाद्मे  त्वं च रुद्र महाबाहो इत्यारभ्यसृष्टिरेषोत्तरोत्तरा इत्यन्तम्। च पुनरिमाः प्रजा उपहन्यां तदाऽहमेव सङ्करस्य नरकसाधनस्य कर्त्ता स्यां भवामि। अयमर्थः  मदाज्ञया ब्रह्मादयः प्रजाः सृजन्ति ताश्चेदहमुपहन्यां तदननुकूलो भवामि तदा सङ्करस्य क्लिष्टस्य कर्त्ता स्यां प्रजानां च मदिच्छाव्यतिरेकेण भक्तिस्वरूपाज्ञाने सति प्रवृत्तौ सङ्करत्वं स्यात् फलाभावे भक्तिफलव्यभिचारोऽपि स्यात् तदापि तत्कर्त्ताऽहमेव स्याम्।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
।।3.24।। उत्सीदेयुः विनश्येयुः इमे सर्वे लोकाः लोकस्थितिनिमित्तस्य कर्मणः अभावात् न कुर्यां कर्म चेत् अहम्। किञ्च संकरस्य च कर्ता स्याम्। तेन कारणेन उपहन्याम् इमाः प्रजाः। प्रजानामनुग्रहाय प्रवृत्तः उपहतिम् उपहननं कुर्याम् इत्यर्थः। मम ईश्वरस्य अननुरूपमापद्येत।।यदि पुनः अहमिव त्वं कृतार्थबुद्धिः आत्मवित् अन्यो वा तस्यापि आत्मनः कर्तव्याभावेऽपि परानुग्रह एव कर्तव्य इत्याह 
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।3.24।।उत्सीदेयुरिति।
### Swami Sivananda (english)
3.24 उत्सीदेयुः would perish? इमे these? लोकाः worlds? न not? कुर्याम् would do? कर्म action? चेत् if? अहम् I? सङ्करस्य of confusion of castes? च and? कर्ता author? स्याम् would be? उपहन्याम् would destroy? इमाःthese? प्रजाः beings.Commentary If I did not engage in action? people would also be inactive. They would not do their duties according to the Varnasrama Dharma (code of morals governing their own order and stage of life). Hence confusion of castes would arise. I would have to destroy these beings.

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### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 3.24 — Karma Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/3/24. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 3.24 — Karma Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/3/24

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