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title: "Bhagavad Gita 3.12 — Karma Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:01:42.439Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/3/12"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 3.12
> Chapter 3 — Karma Yoga (Karm Yog), Verse 12.

## Sanskrit
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।3.12।।
 

## Transliteration
iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ


## Word Meanings
iṣhṭān—desired; bhogān—necessities of life; hi—certainly; vaḥ—unto you; devāḥ—the celestial gods; dāsyante—will grant; yajña-bhāvitāḥ—satisfied by sacrifice; taiḥ—by them; dattān—things granted; apradāya—without offering; ebhyaḥ—to them; yaḥ—who; bhuṅkte—enjoys; stenaḥ—thieves; eva—verily; saḥ—they


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।3.12।। यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है। 
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।3.12।। यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।
### Swami Adidevananda (english)
The gods, pleased by the sacrifice, will bestow upon you the enjoyments you desire. He who enjoys the bounty of the gods without giving them anything in return is but a thief.
### Swami Gambirananda (english)
'Being nourished by sacrifices, the gods will indeed give you the coveted enjoyments. He is certainly a thief who enjoys what has been given by them without offering it to them.'
### Swami Sivananda (english)
The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering anything in return is indeed a thief.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
The devas, gratified with necessary action, will grant you the things sacrificed. Therefore, whoever enjoys their gifts without offering them to these devas is surely a thief.
### Shri Purohit Swami (english)
For, fed by sacrifice, nature will give you all the enjoyment you desire. But he who enjoys what she gives without returning is, indeed, a thief.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
ইষ্টান্ভোগান্হি বো দেবা দাস্যন্তে যজ্ঞভাবিতাঃ৷
তৈর্দত্তানপ্রদাযৈভ্যো যো ভুঙ্ক্তে স্তেন এব সঃ৷৷3.12৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
যজ্ঞের দ্বারা সন্তুষ্ট হয়ে দেবতারা তোমাদের বাঞ্ছিত ভোগ্যবস্তু প্রদান করবেন, তাঁদের প্রদত্ত বস্তু তাঁদেরকে নিবেদন না করে যিনি ভোগ করেন তিনি নিশ্চয়ই চোর।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
 3.12।। व्याख्या--'इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः'--यहाँ भी 'इष्टभोग' शब्दका अर्थ इच्छित पदार्थ नहीं हो सकता। कारण कि पीछेके (ग्यारहवें) श्लोकमें परम कल्याणको प्राप्त होनेकी बात आयी है और उसके हेतुके लिये वह (बारहवाँ) श्लोक है। भोगोंकी इच्छा रहते परम कल्याण कभी हो ही नहीं सकता। अतः यहाँ 'इष्ट' शब्द यज् धातुसे निष्पन्न होनेसे तथा 'भोग' (टिप्पणी प0 132.1) शब्दका अर्थ आवश्यक सामग्री होनेसे उपर्युक्त पदोंका अर्थ होगा वे देवता तुमलोगोंको यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे।यहाँ 'यज्ञभाविताः देवाः' पदोंका तात्पर्य है कि देवता तो अपना अधिकार समझकर मनुष्योंको आवश्यक सामग्री प्रदान करते ही हैं केवल मनुष्योंको ही अपना कर्तव्य निभाना है।'तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते'  ब्रह्माजीने देवताओंके लिये 'ते देवाः' पदोंका प्रयोग किया है क्योंकि उनके सामने मनुष्य थे देवता नहीं। परन्तु यहाँ 'एभ्यः'पद (जो इदम् शब्दसे बनता है) का प्रयोग हुआ है जो समीपताका द्योतक है। भगवान्के लिये सभी समीप ही हैं (गीता 7। 26)। इससे सिद्ध होता है कि अब यहाँसे भगवान्के वचन आरम्भ होते हैं।

  यहाँ 'भुङ्क्ते' (टिप्पणी प0 132.2) पदका तात्पर्य केवल भोजन करनेसे ही नहीं है प्रत्युत शरीरनिर्वाहकी समस्त आवश्यक सामग्री (भोजन, वस्त्र, धन, मकान आदि) को अपने सुख के लिये काममें लानेसे है।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।3.12।। देवताओं को सन्तुष्ट करने पर वे हमें सन्तुष्ट करते हैं कर्मकाण्ड के इस अबाध्य सिद्धान्त को श्रीकृष्ण दोहराते हैं। देव और यज्ञ इन दो शब्दों के पारम्परिक अर्थ के स्थान पर पूर्वश्लोकों के विवरण में बताये हुये अर्थ को हम यदि स्वीकार करें तभी इस श्लोक का अर्थ सत्य प्रमाणित होता है उत्पादनक्षमता (देव) का त्याग और अर्पण की भावना से आचरित कर्म (यज्ञ) के द्वारा पोषण करने पर वह हमें इष्ट फल प्रदान करेगा। यह जीवन का नियम है।जब हम सबको यज्ञ से फल प्राप्त होता है तब उसे आपस में बांटकर उपभोग करने का हमें पूर्ण अधिकार है। किसी भी प्राणी को सामूहिक प्रयत्न में सहयोग दिये बिना दूसरे के कर्मों का लाभ नहीं उठाना चाहिये। पूँजीवादी जीवन व्यवस्था में एक यह दुष्प्रवृत्ति दिखाई देती है कि लाखों कर्मचारियों के सामूहिक कर्मों का अधिक से अधिक लाभ अकेला व्यक्ति उठाना चाहता है। इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति अन्तत सभी कर्मक्षेत्रों में अव्यवस्था को जन्म देती है। परिणाम यह होता है कि जीवन के सामंजस्य में अव्यवस्था फैलाने से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिये संकट उत्पन्न हो जाता है। इस श्लोक के दूसरी पंक्ति में कही हुई बात को आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में इस प्रकार कहते हैं समाज का वह व्यक्ति जो उत्पादन किये बिना भोग करता है राष्ट्र के लिये भारस्वरूप है।यज्ञ (निस्वार्थ सेवा) किये बिना जो देवताओं से भोग प्राप्त करता है भगवान् श्रीकृष्ण उसे सामाजिक चोर की संज्ञा देते हैं। गीताकालीन सम्मानित नैतिक आदर्शों को देखते हुये चोर शब्द का प्रयोग कठोर किन्तु शक्तिशाली है जो भोगी एवं सामाजिक अपराधी व्यक्ति के भ्रष्ट एवं अनादर पूर्ण स्वभाव की ओर संकेत करता है।परन्तु 
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।3.12।।इतश्चाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह  किञ्चेति। कथमस्माभिर्भाविताः सन्तो देवा भावयिष्यन्त्यस्मानिति तदाह  इष्टानिति। यज्ञानुष्ठानेन पूर्वोक्तरीत्या स्वर्गापवर्गयोर्भावेऽपि कथं स्त्रीपशुपुत्रादिसिद्धिरित्याशङ्क्य पूर्वार्धं व्याकरोति  इष्टानभिप्रेतानिति। पश्वादिभिश्च यज्ञानुष्ठानद्वारा भोगो निवर्तनीयोऽन्यथा प्रत्यवायप्रसङ्गादित्युत्तरार्धं व्याचष्टे  तैरिति। आनृण्यमकृत्वेत्यर्थः। अथमर्थः  देवानामृषीणां पितृ़णां च यज्ञेन ब्रह्मचर्येण प्रजया च संतोषमनापाद्य स्वकीयं कार्यकरणसंघातमेव पोष्टुं भुञ्जानस्तस्करो भवतीति।
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।3.12।। किंच ते देवा यज्ञैर्वर्धिता वो युष्मभ्यं इष्टान् भोगान् स्त्रीपुत्रपशुस्वर्णादीन् वितरिष्यन्ति। यस्तु तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा  स्वदेहादीन्येव तर्पयति स तस्कर एव देवादिस्वापहारी।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।3.12।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. 
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।3.12।।किंच इष्टान्पुत्रपश्वादीन्वो युष्मभ्यम्। एभ्यो देवेभ्यस्तद्दत्तानेव व्रीहिपश्वाज्यादीनप्रदायादत्त्वा देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागात्मकं यागं नित्यनैमित्तिकरूपं वैश्वदेवाग्निहोत्रजातेष्ट्यादिरूपमकृत्वेत्यर्थः। अदत्त्वा यो भुङ्क्ते स स्तेन एव।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।3.12।।यज्ञभाविताः यज्ञेन आराधिताः मदात्मका देवा इष्टान् भोगान् वो दास्यन्ते परमपुरुषार्थलक्षणं मोक्षं साधयतां ये इष्टा भोगाः तान् पूर्वपूर्वयज्ञभाविता देवा दास्यन्ते। उत्तरोत्तराराधनापेक्षितान् सर्वान् भोगान् वो दास्यन्ति इत्यर्थः।स्वाराधनार्थता तैः दत्तान् भोगान् तेभ्यः अप्रदाय यो भुङ्क्ते चोर एव सः। चौर्यं हि नाम अन्यदीये तत्प्रयोजनाय एव परिक्लृप्ते वस्तुनि स्वकीयताबुद्धिं कृत्वा तेन स्वात्मपोषणम्। अतः अस्य न परमपुरुषार्थानर्हतामात्रम् अपि तु निरयगामित्वं च भविष्यति इत्यभिप्रायः।तद् एव विवृणोति  
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
।।3.12।।एतदेव स्पष्टीकुर्वन्कर्माकरणे दोषमाह  इष्टानिति। यज्ञैर्भाविताः सन्तो देवा वृष्ट्यादिद्वारेण वः युष्मभ्यं भोगान्दास्यन्ति हि। अतो देवैर्दत्तानन्नादीनेभ्यो देवेभ्यः पञ्चयज्ञादिभिरदत्त्वा यो भुङ्क्ते स तु चोर एव ज्ञेयः।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
।।3.12।।ते देवा भावयन्तु वः 3।11 इत्युक्तस्य पोषणस्य प्रकारोदेवान् भावयत इत्यस्य व्यतिरेके प्रत्यवायश्चोच्यते  इष्टानितिश्लोकेन।इष्टान् इत्यस्यार्थः  उत्तरोत्तराराधनापेक्षितानिति। न हि मुमुक्षुभिरुदरपूरणाद्यर्थं भोगा इष्यन्त इति भावः। बहुवचनासङ्कोचमभिप्रेत्योक्तंसर्वानिति।दास्यन्ते इति कर्त्रभिप्रायक्रियाफलात्मनेपदस्वभावानुरोधेन आत्मार्थपाचकानां चोरत्वसिद्ध्यर्थंस्वाराधनार्थतयेत्युक्तम्। ननु किमत्र चोरत्वम् न हि देवानां भोगानसौ गूढं प्रसह्य वा हरति न च तैर्दत्तस्य स्वहस्तागतस्य भोगश्चौर्यम् न हि राजादिसेवकास्तद्दत्तभोगजीविनश्चोरा इति शूलमारोप्यन्ते एवं च सति सर्वेषां यज्ञादिफलभुजामविशेषेण चोरत्वं प्रसज्यत इत्याशङ्क्याह  चौर्यं हीति। परबुद्ध्या परप्रयोजनत्वेन कल्पितस्य स्वकीयस्य परानुमत्या स्वप्रयोजनतया परिकल्पितस्यान्यदीयस्य च व्यवच्छेदायअन्यदीय इत्यादिविशेषणद्वयम्। तेन स्वात्मपोषणमिति चौर्यस्य फलम् अन्यदीये स्वकीयताबुद्धिकरणमित्येव लक्षणम्। तत्प्रयोजनतयेत्यन्यदीयत्वफलम् तेन स्वात्मपोषणानौचित्यद्योतनम्। वस्तुशब्देन चोरयितव्यावान्तरभेदविवक्षां द्योतयति।बुद्धिं कृत्वेत्यनेन चौर्यस्य नाधिकव्यापारोऽवश्यापेक्षित इति सूचितम्। बुद्धिपूर्वत्वं च द्योतितम्। एवं च सतियोऽन्यथा सन्तम् म.भा.5।52।35 इत्याद्युक्तात्मचौर्यमपि लक्षितं भवति। भगवदीये तद्गतातिशयाधानेच्छयैव परिकल्पिते प्रत्यगात्मनि स्वातिशयावहस्वतन्त्रत्वाभिमानरूपत्वात्तस्य।नन्वेवमप्यत्रोदाहरणे कथं चोरत्वम् उच्यते  देवा हि कर्मभिराराधिता अपि हविर्ग्रहणार्थमेव फलं प्रयच्छन्ति यथा राजानः षड्भागसङ्ग्रहाय स्वाराधकेभ्यः क्षेत्रादिकम् तत्र करप्रदानविमुखाः पुरुषा इव हविरादिकमप्रयच्छन्तो दण्ड्या एव  इति। चोरत्वनिर्देशफलितं व्यनक्ति  अत इति। चोरत्वादित्यर्थः।परमपुरुषार्थानर्हतेत्यनेन विहितकर्माकरणस्याधिकारित्वनिवृत्तिहेतुत्वमपि ख्यापितम्।भविष्यतीत्यनेन प्रत्यवायस्य देहान्तरभावितया योग्यानुपलम्भबाधाभावः सूचितः।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।3.12।।न केवलमित्थमपवर्गे यावत्सिद्धिलाभेऽपि अयं मार्गः  अभ्यसनीय  इत्याह  इष्टानिति।  यज्ञतर्पितानि हि इन्द्रियाणि स्थितिं बध्नन्ति यत्रक्वापि ध्येयादौ इति।  अत एव तद्व्यापारे सति तेषां विषयाणां स्मृतिसंकल्पध्यानादिना भावाः विषयाः इन्द्रियैरेव दत्ताः।  यदि तेषामेवोपभोगाय विषया (S K omit विषयाः)  न दीयन्ते तर्हि स्तेनत्वं चौर्यं स्यात् छद्मचारित्वात्।  उक्तं हि पूर्वमेव भगवता मूढाचारः स उच्यते (II 6 ) इति।  अतो़ऽयं वाक्यार्थः  यः सुखोपायं सिद्धिम् अपवर्गं वा प्रेप्सति तेन इन्द्रियकौतुकनिवृत्तिमात्रफलतयैव भोगा यथोपनतमासेव्या इति।
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।3.12।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।3.12।।न केवलं पारत्रिकमेव फलं यज्ञात् किंत्वेहिकमपीत्याह  इष्टानभिलषितान्भोगान्पश्वन्नहिरण्यादीन् वो युष्मभयं देवा दास्यन्ते वितरिष्यन्ति। हि यस्मात् यज्ञैर्भावितास्तोषितास्ते। यस्मात्तेः ऋणवद्भवद्भ्योः दत्ता भोगास्तस्मात्तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽप्रदाय यज्ञेषु देवोद्देशेनाहुतीरसंपाद्य यो भुङ्क्ते देहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव स देवस्वापहारी देवर्णानपाकरणात्।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।3.12।।ननु श्रेयसोऽनेकरूपत्वात्िकँल्लक्षण श्रेयःप्राप्तिर्भविष्यतीत्याह  इष्टानिति। वो युष्मभ्यं यज्ञभाविता देवा इष्टान् भोगान् वृष्ट्यादिकरणेनान्नाद्दीन् दास्यन्ते। यद्वा वो युष्मभ्यं इष्टान् यदेवेष्टं भवताम्। भगवत्सेवौपयिकबलाद्यर्थकान्नादिसम्पत्त्यर्थं वृष्ट्यादिकं करिष्यन्तीत्यर्थः। ननु तैरेवान्नं देयं चेत्तदा तेभ्यः किमस्य यागकरणेन इत्यत आह  तैरिति। तैर्दत्तान् अन्नादीन् एभ्यस्तद्दातृभ्योऽप्रदाय अदत्त्वा यो भुङ्क्ते भोगं करोति स स्तेन एव चोर एवेत्यर्थः।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
।।3.12।। इष्टान् अभिप्रेतान् भोगान् हि वः युष्मभ्यं देवाः दास्यन्ते वितरिष्यन्ति स्त्रीपशुपुत्रादीन् यज्ञभाविताः यज्ञैः वर्धिताः तोषिताः इत्यर्थः। तैः देवैः दत्तान् भोगान् अप्रदाय अदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा इत्यर्थः एभ्यः देवेभ्यः यः भुङ्क्ते स्वदेहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव सः देवादिस्वापहारी।।ये पुनः 
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।3.12।।इष्टानिति। तैर्वृष्ट्यादिना दत्तानन्नादीन् अप्रदाय एभ्यो यो भुङ्क्ते स स्तेन एवेति जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवाञ्जायतेः () ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजाभिः पितृभ्य एष वानृणः     इति श्रुतेस्त्रयाणामृणी चायमित्यतस्तैः पूर्वमृणं प्रदत्तवांस्तेभ्यः पुनर्न प्रत्ययेच्चोर एवेति तदनिवेदने दोष उक्तः।
### Swami Sivananda (english)
3.12 इष्टान् desired? भोगान् objects? हि so? वः to you? देवाः the gods? दास्यन्ते will give? यज्ञभाविताः nourished by sacrifice? तैः by them? दत्तान् give? अप्रदाय without offering? एभ्यः to them? यः who? भुङ्क्ते enjoys? स्तेनः thief? एव verily? सः he.Commentary When the gods are pleased with you sacrifices? they will bestow on you all the desired objects such as children? cattle? property? etc. He who enjoys what has been given to him by the gods? i.e.? he who gratifies the cravings of his own body and the senses without offering anything to the gods in return is a veritable thief. He is really a dacoit of the property of the gods.

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### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 3.12 — Karma Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/3/12. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 3.12 — Karma Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/3/12

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