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title: "Bhagavad Gita 2.43 — Sankhya Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T13:59:23.510Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/2/43"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 2.43
> Chapter 2 — Sankhya Yoga (Sānkhya Yog), Verse 43.

## Sanskrit
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।2.43।।
 

## Transliteration
kāmātmānaḥ svarga-parā 

 janma-karma-phala-pradām

 kriyā-viśeṣa-bahulāṁ

 bhogaiśvarya-gatiṁ prati


## Word Meanings
kāmaātmānaḥ—desirous   of  sense   gratification;  svarga-parāḥ—aiming to  achieve heavenly    planets;    janma-karma-phala-pradām—resulting  in  fruitive    action, good        birth,     etc.;      kriyā-viśeṣa—pompous       ceremonies;        bahulām—various; bhoga—sense       enjoyment;     aiśvarya—opulence;     gatim—progress;    prati—towards.

## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।2.42 -- 2.43।। हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
 
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।2.43।। कामनाओं से युक्त? स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं।।
### Swami Adidevananda (english)
- O Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, "There is nothing else." They are full only of worldly desires and they yearn for heaven. They speak flowery words that offer mirth as the fruit of work. They view the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a focused mind.
### Swami Gambirananda (english)
O son of Prtha, those undiscerning people who utter this flowery talk, which promises birth as a result of rites and duties, and is full of various special rites meant for the attainment of enjoyment and affluence, remain engrossed in the utterances of the Vedas and declare that nothing else exists; their minds are full of desires and they have heaven as their goal.
### Swami Sivananda (english)
Full of desires, with heaven as their goal, (they speak words that are directed to ends) leading to new births as the result of their works, and prescribe various methods abounding in specific actions, for the attainment of pleasure and power.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
-. O son of Prtha! Those whose very nature is desire, whose goal is heaven, who esteem only the Vedic declaration [of fruits], who declare that there is nothing else, who proclaim this flowery speech about the paths to the lordship of the objects of enjoyment—paths that are full of different actions—and who desire action alone as a fruit of their birth—they are men without insight.
### Shri Purohit Swami (english)
Consulting only their own desires, they construct their own heaven, devising arduous and complex rites to secure their own pleasure and power; and the only result is rebirth.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
কামাত্মানঃ স্বর্গপরা জন্মকর্মফলপ্রদাম্৷
ক্রিযাবিশেষবহুলাং ভোগৈশ্বর্যগতিং প্রতি৷৷2.43৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
হে পার্থ! তথাকথিত বেদ অনুগামী অবিবেকী মানুষ কর্মফল ভিন্ন অন্য কিছুর অস্তিত্য নেই এই সমস্ত পুষ্পিত বাক্য বলেন। ইন্দ্রিয়সুখ ভোগ ও ঐশ্বর্যের প্রতি আকৃষ্ট হয়ে কামনাযুক্ত, স্বর্গপরায়ণ, জন্মরূপ কর্মফল প্রদানকারী বিবিধ আড়ম্বরপূর্ণ ক্রিয়াকলাপ করেন।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।2.43।। व्याख्या-- 'कामात्मानः'-- वे कामनाओंमें इतने रचे-पचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता, कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता, कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है, उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष  'कामात्मानः'  हैं।
स्वयं तो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी घट-बढ़ नहीं होती, पर कामना आती-जाती रहती है और घटती-बढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना--ये दोनों सर्वथा अलग-अलग हैं। परन्तु कामनामें रचे-पचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता।
 'स्वर्गपराः'-- स्वर्गमें बढ़िया-से-बढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं, इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रात-दिन लगे रहते हैं।
यहाँ  'स्वर्गपराः'  पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है, जो वेदोंमें, शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं।
 'वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः'-- वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं ,इसलिये वे 'वेदवादरताः' हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचे-पचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है।
 'यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः'-- जिनमें सत्-असत्, नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशीका विवेक नहीं है,ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है, उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं।
यहाँ 'पुष्पिताम्' कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूल-पत्ती ही है, फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है, फूल-पत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल--स्वर्गादिका भोग है, वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है, उसमें स्थायीपना नहीं है।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।2.43।। no commentary.उससे (वाणी से) जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और ऐश्वर्य में आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती अर्थात् वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य नहीं 
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।2.43।।प्रकृतान्प्रवक्तृ़नविवेकिनो व्यवसायात्मकबुद्धिभाक्त्वासंभवसिद्ध्यर्थं विधान्तरेण विशिनष्टि   ते   चेति।  तेषां संसारपरिवर्तनपरिदर्शनार्थं प्रस्तुतां वाचमेव विशिनष्टि   जन्मेति।  ननु पुंसां कामस्वभावत्वमयुक्तं चेतनस्येच्छावतस्तदात्मत्वानुपपत्तेरिति तत्राह   कामपरा इति।  तत्परत्वं तत्तत्फलार्थित्वेन तत्तदुपायेषु कर्मस्वेव प्रवृत्ततया कर्मसंन्यासपूर्वकाज्ज्ञानाद्बहिर्मुखत्वम्। ननु कर्मनिष्ठानामपि   परमपुरुषार्थापेक्षया मोक्षोपाये ज्ञाने भवत्याभिमुख्यमिति नेत्याह   स्वर्गेति।  तत्परत्वं तस्मिन्नेवासक्ततया तदतिरिक्तपुरुषार्थराहित्यनिश्चयवत्त्वम्। उच्चावचमध्यमदेहप्रभेदग्रहणं जन्मवाचो यथोक्तफलप्रदत्वमप्रामाणिकमित्याशङ्क्यानुष्ठानद्वारा तदुपपत्तिरित्याह   क्रियेति।  क्रियाणामनुष्ठानानां यागदानादीनां विशेषा देशकालाधिकारिप्रयुक्ताः सप्ताहानेकाहलक्षणास्ते खल्वस्यां वाचि प्राचुर्येण प्रतिभान्तीत्यर्थः। कथं यथोक्तायां वाचि क्रियाविशेषाणां बाहुल्येनावस्थानमित्याशङ्क्य प्रकाश्यत्वेनेत्येतद्विशदयति   स्वर्गेति।  तथापि तेषां मोक्षोपायत्वोपपत्तेस्तन्निष्ठानां मोक्षाभिमुख्यं भविष्यति नेत्याह   भोगेति।  यथोक्तां वाचमभिवदतां पर्यवसानं दर्शयति   तद्बहुलामिति। 
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।2.43।।यतः कामे आत्मान्तःकरणं येषाम् अतएव स्वर्गएव परः पुरुषार्थो येषां ते कर्मणः फलं जन्मैव कर्मफलं प्रददातीति तथा तां वेदवाचा कर्मणि प्रवृत्तिः कर्मणा जन्मलाभः नतु वेदवाचः स्वतन्त्रं जन्मादिप्रदातृत्वमस्तीत्यभिप्रेत्याचार्यैर्जन्म च तत्र कर्मं च तत्फलं च प्रददातीति न व्याख्यातम्। यतो भोगश्चैश्वर्यं च तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति क्रियाणां विशेषा बहुला यस्यां तां वाचं प्रवदन्तीत्यनुषङ्गः।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।2.43।।भोगैश्वर्यमतिं तत्प्राप्तिं प्रति। तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः।
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।2.43।।तथा भोगश्च ऐश्वर्यं च तयोर्गतिः प्राप्तिस्तां प्रति तदर्थमित्यर्थः। कामात्मानः कामग्रस्तचित्ताः। अतएव स्वर्गपराः। कीदृशीं भोगैश्वर्यगतिम्। जन्मकर्मफलप्रदाम्। प्राप्तभोगैश्वर्यो हि पुरुषस्तद्वासनावासितः पुनर्भोगैश्वर्यप्राप्तये जन्म लभते तदर्थं कर्माणि च कुरुते फलं च ततो भोगादिकं प्राप्नोतीति चक्रमनिशमावर्तते। तेन निष्ठातश्च्युतो भवतीत्यर्थः। किञ्च क्रियाविशेषेण बहुलां यथा यथा वित्तव्ययायासाद्याधिक्यं तथा तथा भोगैश्वर्यप्राप्तेरप्याधिक्यमित्यर्थः। एतेनात्यन्तायाससाध्येष्वपि कर्मसु फललोभात्सज्जन्त इत्युक्तम्। भाष्ये भोगैश्वर्यगतिं प्रति साधनभूताः ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रादयः तद्बहुलां जन्मरूपं यत् कर्मफलं तत्प्रदां च वाचमेवेति व्याख्यातम्।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।2.43।। याम् इमां पुष्पितां  पुष्पमात्रफलाम् आपातरमणीयां  वाचम् अविपश्चितः  अल्पज्ञा भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानां प्रवदन्ति  वेदवादरताः  वेदेषु ये स्वर्गादिफलवादाः तेषु सक्ताः  न अन्यद् अस्ति इति   वादिनः  तत्सङ्गातिरेकेण स्वर्गा देः अधिकं फलं न अन्यद् अस्ति इति वदन्तः।  कामात्मानः  कामप्रवणमनसः  स्वर्गपराः  स्वर्गपरायणाः स्वर्गादिफलावसाने पुन र्जन्मकर्मा ख्य फलप्रदां क्रियाविशेषबहुलां  तत्त्वज्ञानरहिततया क्रियाविशेषप्रचुरां तेषां  भोगैश्वर्यगतिं प्रति  वर्तमानां याम् इमां वाचं ये प्रवदन्ति इति सम्बन्धः।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
।।2.43।।अतएव   कामात्मान इति।  कामात्मानः कामाकुलचित्ताः। अतः स्वर्ग एव परः पुरुषार्थो येषां ते। जन्म च तत्र कर्माणि च तत्फलानि च प्रददातीति तथा ताम्। भोगैश्वर्ययोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषास्ते बहुला यस्यां तां प्रवदन्तीत्यनुषङ्गः।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।2.43  2.45।।तथाच  यामिमामित्यादि।  ये कामाभिलाषिणः ते स्वयमेतां वाचं वेदात्मिकां पुष्पितां भविष्यत्स्वर्गफलेन ( N omit भविष्यत् S reads भविष्यता) व्याप्तां वदन्ति।  अत एव जन्मनः कर्मैव फलमिच्छन्ति ते अविपश्चितः।  ते च तयैव स्वयं कल्पितया वेदवाचा अपहृतचित्ताः व्यवसायबुद्धियुक्ता अपि न समाधियोग्याः तत्र फलनिश्चयत्वात्।  इति श्लोकत्रयस्य तात्पर्यम्।
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।2.43।।गतिशब्दस्यावगतिरप्यर्थः प्रतीयेतेत्यत आह   भोगे ति। अन्यथाऽसदनुवादप्रसङ्गादिति भावः। एषाऽपि कथं निन्दा इत्यत आह   तत्प्राप्ती ति। मोक्षं वेदफलं न मन्यत इत्यर्थः।
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।2.42  2.44।।अव्यवसायिनामपि व्यवसायात्मिका बुद्धिः कुतो न भवति प्रमाणस्य तुल्यत्वादित्याशङ्क्य प्रतिबन्धकसद्भावान्न भवतीत्याह त्रिभिः  यामिमां वाचं प्रवदन्ति तया वाचापहृतचेतसामविपश्चितां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीत्यन्वयः। इमामध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धां पुष्पितां पुष्पितपलाशवदापातरमणीयांसाध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्निरतिशयफलाभावाच्च। कुतो निरतिशयफलत्वाभावस्तत्राह  जन्मकर्मफलप्रदां जन्म चापूर्वशरीरेन्द्रियादिसंबन्धलक्षणं तदधीनं च कर्म तत्तद्वर्णाश्रमाभिमाननिमित्तं तदधीनं च फलं पुत्रपशुस्वर्गादिलक्षणं विनश्वरं तानि प्रकर्षेण घटीयन्त्रवदविच्छेदेन ददातीति तथा ताम्। कुतएवमत आह  भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां अमृतपानोर्वशीविहारपारिजातपरिमलादिनिबन्धनो यो भोगस्तत्कारणं च यदैश्वर्यं देवादिस्वामित्वं तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादयस्तैर्बहुलां विस्तृताम्। अतिबाहुल्येन भोगैश्वर्यसाधनक्रियाकलापप्रतिपादिकामिति यावत्। कर्मकाण्डस्य हि ज्ञानकाण्डापेक्षया सर्वत्रातिविस्तृतत्वं प्रसिद्धम्। एतादृशीं कर्मकाण्डलक्षणां वाचं प्रवदन्ति प्रकृष्टां परमार्थस्वर्गादिफलामभ्युपगच्छन्ति। के। येऽविपश्चितो विचारजन्यतात्पर्यपरिज्ञानशून्याः। अतएव वेदवादरताः वेदे ये सन्ति वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवमादयस्तेष्वेव रता वेदार्थसत्यत्वेनैवमेवैतदिति मिथ्याविश्वासेन संतुष्टाः। हे पार्थ अतएव नान्यदस्तीतिवादिनः कर्मकाण्डापेक्षया नास्त्यन्यज्ज्ञानकाण्डं सर्वस्यापि वेदस्य कार्यपरत्वात् कर्मफलापेक्षया च नास्त्यन्यन्निरतिशयं ज्ञानफलमिति वदनशीलाः। महता प्रबन्धेन ज्ञानकाण्डविरुद्धार्थभाषिण इत्यर्थः। कुतो मोक्षद्वेषिणस्ते। यतः कामात्मानः काम्यमानविषयशताकुलचित्तत्वेन काममयाः। एवंसति मोक्षमपि कुतो न कामयन्ते। यतः स्वर्गपराः स्वर्ग एवोर्वश्याद्युपेतत्वेन पर उत्कृष्टो येषां ते तथा। स्वर्गातिरिक्तः पुरुषार्थो नास्तीति भ्राम्यन्तो विवेकवैराग्याभावान्मोक्षकथामपि सोढुमक्षमा इति यावत्। तेषां च पूर्वोक्तभोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानां क्षयित्वादिदोषादर्शनेन निविष्टान्तःकरणानां तया क्रियाविशेषबहुलया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो विवेकज्ञानं येषां तथाभूतानामर्थवादाः स्तुत्यर्थास्तात्पर्यविषये प्रमाणान्तराबाधिते वेदस्य प्रामाण्यमिति सुप्रसिद्धमपि ज्ञातुमशक्तानां समाधावन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। न भवतीत्यर्थः। समाधिविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषां न भवतीति वा। अधिकरणे विषये वा सप्तम्यास्तुल्यत्वात्। विधीयत इति कर्मकर्तरि लकारः। समाधीयतेऽस्मिन्सर्वमिति व्युत्पत्त्या समाधिरन्तःकरणं वा परमात्मा वेति नाप्रसिद्धार्थकल्पनम्। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तं व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नोत्पद्यत इति व्याख्याने तु रूढिरेवादृता। अयंभावःयद्यति काम्यान्यग्निहोत्रादीनि शुद्ध्यर्थेभ्यो न विशिष्यन्ते तथापि फलाभिसंधिदोषान्नाशयशुद्धिं संपादयन्ति। भोगानुगुणा तु शुद्धिर्न ज्ञानोपयोगिनी। एतदेव दर्शयितुं भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति पुनरुपात्तम्। फलाभिसन्धिभन्तरेण तु कृतानि कर्माणि ज्ञानोपयोगिनीं शुद्धिमादधतीति सिद्धं विपश्चिदविपश्चितोः फलवैलक्षण्यम्। विस्तरेण चैतदग्रे प्रतिपादयिष्यते।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।2.43।।ननु तेषां तथाकथनं किं प्रयोजनकं इत्याकाङ्क्षायामाह  कामात्मान इति कामनाव्याप्तरूपाः। ननु कथं कामनायां तुच्छफले प्रवर्त्तन्त इत्याशङ्क्याह  स्वर्गपरा इति। स्वर्ग एव परो मोक्षरूपं येषां तेषाम्। स्वर्गस्य तथाज्ञानार्थं पूर्ववाचं विशिनष्टि  जन्मकर्मफलप्रदाम्। जन्म उत्तमयोनौ तत्रोत्तमं कर्म तथोत्तमफलं च तानि प्रकर्षेण ददाति तां तथा भोगैश्वर्यगतिं भोगैश्वर्यप्राप्तिं प्रति क्रियाविशेषा बहुला यस्यां तां तथा फलरूपां वदन्ति।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
।।2.43।।   कामात्मानः  कामस्वभावाः कामपरा इत्यर्थः।  स्वर्गपराः  स्वर्गः परः पुरुषार्थः येषां ते स्वर्गपराः स्वर्गप्रधानाः।  जन्मकर्मफलप्रदां  कर्मणः फलं कर्मफलं जन्मैव कर्मफलं जन्मकर्मफलं तत् प्रददातीति जन्मकर्मफलप्रदा तां वाचम्। प्रवदन्ति इत्यनुषज्यते।  क्रियाविशेषबहुलां  क्रियाणां विशेषाः क्रियाविशेषाः ते बहुला यस्यां वाचि तां स्वर्गपशुपुत्राद्यर्थाः यया वाचा बाहुल्येन प्रकाश्यन्ते।  भोगैश्वर्यगतिं   प्रति  भोगश्च ऐश्वर्यं च भोगैश्वर्ये तयोर्गतिः प्राप्तिः भोगैश्वर्यगतिः तां प्रति साधनभूताः ये क्रियाविशेषाः तद्बहुलां तां वाचं प्रवदन्तः मूढाः संसारे परिवर्तन्ते इत्यभिप्रायः।।तेषां च  
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।2.43।।किम्भूतास्तेऽविपश्चितः वेदवादतात्पर्यानभिज्ञाः। भोगैश्वर्यगतिं प्रति कामात्मानः कामयते आत्मा येषाम्। तथा स्वर्गलोक एव परः प्राप्यं फलं येषाम्। किम्भूतां वाचम् जन्मकर्मफलप्रदाम्। गतिविशेषणं वा। क्रियाविशेषबहुलां वाचं जन्मकर्मफलप्रदां वा प्रवदन्तीत्यन्वयः।
### Swami Sivananda (english)
2.43 कामात्मानः full of desires? स्वर्गपराः with heaven as their highest goal? जन्मकर्मफलप्रदाम् leading to (new) births as the result of their works? क्रियाविशेषबहुलाम् exuberant with various specifi actions? भोगैश्वर्यगतिम् प्रति for the attainment of pleasure and lordship.No commentary.

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### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 2.43 — Sankhya Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/2/43. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 2.43 — Sankhya Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/2/43

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