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title: "Bhagavad Gita 11.12 — Vishwaroopa Darshana Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:07:55.053Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/11/12"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 11.12
> Chapter 11 — Vishwaroopa Darshana Yoga (Viśhwarūp Darśhan Yog), Verse 12.

## Sanskrit
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।11.12।।
 

## Transliteration
divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā
yadi bhāḥ sadṛiśhī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ


## Word Meanings
divi—in the sky; sūrya—suns; sahasrasya—thousand; bhavet—were; yugapat—simultaneously; utthitā—rising; yadi—if; bhāḥ—splendor; sadṛiśhī—like; sā—that; syāt—would be; bhāsaḥ—splendor; tasya—of them; mahā-ātmanaḥ—the great personality


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।11.12।। अगर आकाशमें एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ, तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्मा-(विराट् रूप परमात्मा-) के प्रकाशके समान शायद ही हो।
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।11.12।। आकाश में सहस्र सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश होगा, वह उस (विश्वरूप) परमात्मा के प्रकाश के सदृश होगा।।
 
### Swami Adidevananda (english)
If a thousand suns were to rise at once in the sky, the resulting splendour would be like the splendour of that mighty One.
### Swami Gambirananda (english)
Should the effulgence of a thousand suns blaze forth simultaneously in the sky, that might be akin to the radiance of that exalted One.
### Swami Sivananda (english)
If the splendour of a thousand suns were to blaze out simultaneously in the sky, that would be the splendour of that mighty being.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
If the splendour of a thousand suns were to burst forth at once in the sky, would that be equal to the splendour of that Mighty Self?
### Shri Purohit Swami (english)
Could a thousand suns blaze forth together, it would be but a faint reflection of the radiance of the Lord God.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
দিবি সূর্যসহস্রস্য ভবেদ্যুগপদুত্থিতা৷
যদি ভাঃ সদৃশী সা স্যাদ্ভাসস্তস্য মহাত্মনঃ৷৷11.12৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
যদি আকাশে সহস্র সূর্য একসঙ্গে উদিত হয়, তাহলে সেই প্রভা মহাত্মার প্রভার কিঞ্চিত সদৃশ হতে পারে।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।11.12।। व्याख्या--'दिवि सूर्यसहस्रस्य ৷৷. तस्य महात्मनः'--जैसे आकाशमें हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश एक चन्द्रमाके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता और हजारों चन्द्रमाओंका मिला हुआ प्रकाश एक सूर्यके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता, ऐसे ही आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश विराट् भगवान्के प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता। तात्पर्य यह हुआ कि हजारों सूर्योंका प्रकाश भी विराट् भगवान्के प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता। इस प्रकर जब हजारों सूर्योंके प्रकाशको उपमेय बनानेमें भी दिव्यदृष्टिवाले सञ्जयको संकोच होता है, तब वह प्रकाश विराट्रूप भगवान्के प्रकाशका उपमान हो ही कैसे सकता है! कारण कि सूर्यका प्रकाश भौतिक है, जब कि विराट् भगवान्का प्रकाश दिव्य है। भौतिक प्रकाश कितना ही बड़ा क्यों न हो,,दिव्य प्रकाशके सामने वह तुच्छ ही है। भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाशकी जाति अलग-अलग होनेसे उनकी आपसमें तुलना नहीं की जा सकती। हाँ, अङ्गुलिनिर्देशकी तरह भौतिक प्रकाशसे दिव्य प्रकाशका संकेत किया जा सकता है। यहाँ सञ्जय भी हजारों सूर्योंके भौतिक प्रकाशकी कल्पना करके विराट्रूप भगवान्के प्रकाश-(तेज-) का लक्ष्य कराते हैं। 
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।11.12।। अन्ध राजा धृतराष्ट्र को शीघ्रता में विश्वरूप की रूपरेखा का वर्णन करने के पश्चात्? अब संजय उस विराट् पुरुष की महिमा का वर्णन करता है। अपने विराट् रूप में भगवान् अपने ही दिव्य प्रकाश से चमक रहे थे और उनका यह तेजस्वी वैभव नेत्रों को चकाचौंध कर रहा था और सम्भवत? इस एक और कारण से संजय पूर्व के दो श्लोकों में अधिक विस्तृत जानकारी नहीं दे पाया। भगवान् के इस प्रकाश का वर्णन करने के लिए संजय? एक विचित्र किन्तु प्रभावशाली उपमा यहाँ देता है।विराट् पुरुष के उस गौरवमय पुरुष का तेज ऐसा था? मानो? आकाश में सहस्र सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। उपनिषदों में भी आत्मा का वर्णन कुछ इसी प्रकार किया गया है? परन्तु? यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संजय के मुख से? और विशेषकर जब वह भगवान् श्रीकृष्ण के ईश्वरीय रूप का वर्णन कर रहा है? इस उपमा को विशेष ही आकर्षण और गौरव प्राप्त होता है।और अधिक विवरण देकर इस दृश्य को और अधिक सुन्दर बनाते हुए संजय कहता है
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।11.12।।ननु प्रकृष्टस्य भगवतो रूपस्य दीप्तिरस्ति न वा? न चेत्काष्ठादिसाम्यं? यद्यस्ति कीदृशी सेत्याशङ्क्याह -- या पुनरिति। सा यदि स्यात्तद्भासः सदृशी सेति योजना। असंभाविताभ्युपगमार्थो यदिशब्दः। स्याच्छब्दो निश्चयार्थः। सा कथंचित्सदृशी संभवति ननु भवत्येवेति विवक्षित्वाह -- यदि वेति।
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।11.12।।तत्र दृष्टान्ताकाङ्क्षयामाह। दिवि अन्तरिक्षे स्वर्गे वा सूर्याणआं सहस्त्रस्य युगपदुत्थितस्य युगपदुत्थिता भा यदि भवेत् सा तस्य महात्मनो विश्वरुपस्य भासः दीप्तेः सदृशी तुल्या स्यात् यदि वा न स्यादिति विश्वरुपस्य भा अतिरित्यत इत्याशयः।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।11.12।।सहस्रशब्दोऽनन्तवाची। तदपि पाकशासनविक्रम इत्यादिवत्प्रत्यायनार्थमेव। तथा हि ऋग्वेदखिलेषु -- अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि इति महातात्पर्याच्च प्राबल्यं? न च परिमाणोक्त्या किञ्चित्प्रयोजनम्।
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।11.12।।दिवि अन्तरिक्षे। भाः दीप्तिः। भासः दीप्तेः। अभूतोपमेयम्। निरुपमतामेव तस्य दीप्तेर्दर्शयतिउभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहौ इत्यादिवत्।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।11.12।।तेजसः अपरिमितत्वदर्शनार्थम् इदम्। अक्षयतेजःस्वरूपम् इत्यर्थः।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
।।11.12।। विश्वरूपदीप्तेर्निरुपमत्वमाह -- दिवीति। दिव्याकाशे सूर्यसहस्रस्य युगपदुत्थितस्य यदि युगपदुत्थिता भाः प्रभा भवेत् तर्हि सा तदा महात्मनो विश्वरूपस्य भासः प्रभायाः कथंचित्सृदशी स्यात्। नान्योपमास्तीत्यर्थः। तथाभूतं रूपं दर्शयामासेति पूर्वेणान्वयः।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
।।11.12।।दिवि इत्यादिश्लोकस्य सङ्गतिमाह -- तामेवेति। निर्दिष्टस्य भास्वरत्वस्य निरतिशयत्वलक्षणो विशेष उच्यत इत्यर्थः। सङ्ख्याविशेषेण परिच्छिन्नत्वशङ्काव्युदासायाहतेजस इति।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।11.12।।No commentary.
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।11.12।।दिवि सूर्यसहस्रस्य इति विश्वरूपस्य सहस्रसूर्योपमप्रभत्वमुच्यते तत्र सहस्रशब्दो दशशतवाचीति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- सहस्रेति। अनन्तसूर्योपमप्रभत्वमपि भगवतो न वास्तवं? निरुपमत्वात् किं तर्हि इत्यत आह -- तदपीति। प्रत्यायनार्थं बुद्धिप्रवेशनार्थमेवोच्यते। यथा भगवतो दाशरथेः पाकशासनोपमपराक्रमत्वमित्यर्थः। सहस्रशब्दस्य प्रसिद्धार्थपरित्यागः कुतः इत्यत आह -- तथा हीति। ततस्ततः सूर्यादेरपि। विलक्षण इति शेषः। कुतः श्रुत्या गीतावाक्यस्य बाधः इति चेत्? शतं सहस्रमिति अपरिमितनामानीति? गीतावाक्यस्य सावकाशत्वेन दौर्बल्यात्? श्रुतेर्निरवकाशत्वेन प्राबल्यात् इतश्च श्रुतेः प्राबल्यमित्याह -- महातात्पर्याच्चेति। समस्तागमानां महाप्रयोजनाय यद्भगवति महातात्पर्यं श्रुतेस्तदानुकूल्यात्? गीतावाक्यस्य तत्प्रातिकूल्यादित्यर्थः। कथं गीतावाक्यस्य तत्प्रातिकूल्यं इति चेत्? किं भगवतः परिमितप्रभत्वमेव वस्तुतः उतापरिमितप्रभस्याप्यत्र सहस्रसूर्योपमप्रभत्वमुच्यते नाद्यः -- सकलश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणविरोधात्। द्वितीये त्वपरिमितस्य परिमाणोक्त्या किञ्चिदपि प्रयोजनं न सिध्यति। कुतो महत् इत्याह -- न चेति। 
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।11.12।।देवमित्युक्तं विवृणोति -- दिवीति। दिवि अन्तरिक्षे सूर्याणां सहस्रस्य अपरिमितसूर्यसमूहस्य युगपदुदितस्य युगपदुत्थिता भाः प्रभा यदि भवेत् तदा सा तस्य महात्मनो विश्वरूपस्य भासो दीप्तेः सदृशी तुल्या यदि स्याद्यदि वा न स्यात् ततोपि नूनं विश्वरूपस्यैव भा अतिरिच्येतेत्यहं मन्ये। अन्या तूपमा नास्त्येवेत्यर्थः। अत्राविद्यमानाध्यवसायात्तदभावेनोपमाभावपरादभूतोपमारूपेयमतिशयोक्तिरुत्प्रेक्षां व्यञ्जती सर्वथा निरुपमत्वमेव व्यनक्ति।उभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहौ इत्यादिवत्।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।11.12।।तस्य स्वरूपस्याऽप्रमेयं तेजस्स्वरूपमाह -- दिवीति। दिवि स्वर्गे सूर्यसहस्रस्य युगपत् एकदैव उदितस्य युगपदेव उत्थिता भाः प्रभा यदि भवेत् सा तस्य महात्मनः पुरुषोत्तमस्य अनेकात्मरूपस्य भासः सदृशी स्यात्। किन्तु न स्यादेवेति काकूक्तिः। एतादृशं स्वरूपम्।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
।।11.12।। --,दिवि अन्तरिक्षे तृतीयस्यां वा दिवि सूर्याणां सहस्रं सूर्यसहस्रं तस्य युगपदुत्थितस्य सूर्यसहस्रस्य या युगपदुत्थिता भाः? सा यदि? सदृशी स्यात् तस्य महात्मनः विश्वरूपस्यैव भासः। यदि वा न स्यात्? ततः विश्वरूपस्यैव भाः अतिरिच्यते इत्यभिप्रायः।।किञ्च --,
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।11.12।।एवं सञ्जयो दर्शनं रूपं वर्णयित्वा तस्याऽलौकिकत्वमभूतोपमावर्णनेनाह -- दिवीत्यादि। एवमभूतोपमया लोकविलक्षणत्वमुक्तम्।
### Swami Sivananda (english)
11.12 दिवि in the sky? सूर्यसहस्रस्य of a thousand suns? भवेत् were? युगपत् at once (simultaneously)? उत्थिता arisen? यदि if? भाः splendour? सदृशी like? सा that? स्यात् would be? भासः splendour? तस्य of that? महात्मनः of the mighty Being (great soul).Commentary Divi here means in the Antariksha or the sky.Mahatma here refers to the great Soul or the mighty Being? the Cosmic Form.

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Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 11.12 — Vishwaroopa Darshana Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/11/12. [Accessed: 2026-06-11].

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Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 11.12 — Vishwaroopa Darshana Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/11/12

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