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title: "Bhagavad Gita 10.22 — Vibhooti Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:03:51.389Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/10/22"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 10.22
> Chapter 10 — Vibhooti Yoga (Vibhūti Yog), Verse 22.

## Sanskrit
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।।10.22।।
 

## Transliteration
vedānāṁ sāma-vedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ
indriyāṇāṁ manaśh chāsmi bhūtānām asmi chetanā


## Word Meanings
vedānām—amongst the Vedas; sāma-vedaḥ—the Sāma Veda; asmi—I am; devānām—of all the celestial gods; asmi—I am; vāsavaḥ̣—Indra; indriyāṇām—of amongst the senses; manaḥ—the mind; ca—and; asmi—I am; bhūtānām—amongst the living beings; asmi—I am; chetanā—consciousness


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।10.22।। मैं वेदोंमें सामवेद हूँ, देवताओंमें इन्द्र हूँ, इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ।
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।10.22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ।।
 
### Swami Adidevananda (english)
Of the Vedas, I am the Samaveda; of gods, I am Indra; of sense-organs, I am the mind; and of living beings, I am consciousness.
### Swami Gambirananda (english)
Among the Vedas, I am the Sama-Veda; among the gods, I am Indra. Among the organs, I am the mind, and I am the intelligence in creatures.
### Swami Sivananda (english)
Among the Vedas, I am the Sama-Veda; among the gods, I am Vasava; among the senses, I am the mind; and among living beings, I am intelligence.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
Of the Vedas, I am the Samaveda; of the gods, I am Vasava (Indra); of the sense-organs, I am the mind; of the beings, I am the consciousness.
### Shri Purohit Swami (english)
Of the Vedas, I am the hymns; I am the electric force in the powers of nature; of the senses, I am the mind; and I am the intelligence in all that lives.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
বেদানাং সামবেদোস্মি দেবানামস্মি বাসবঃ৷
ইন্দ্রিযাণাং মনশ্চাস্মি ভূতানামস্মি চেতনা৷৷10.22৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
বেদের মধ্যে আমি সামবেদ, দেবতাদের মধ্যে আমি ইন্দ্র, ইন্দ্রিয়ের মধ্যে আমি মন এবং প্রাণীদের মধ্যে আমি চেতনা।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।10.22।। व्याख्या--'वेदानां सामवेदोऽस्मि'--वेदोंकी जो ऋचाएँ स्वरसहित गायी जाती हैं, उनका नाम सामवेद है। सामवेदमें इन्द्ररूपसे भगवान्की स्तुतिका वर्णन है। इसलिये सामवेद भगवान्की विभूति है।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।10.22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ  ऋग्वेद का सार ही सामवेद है। चारों वेदों में ऋग्वेद का स्थान सबसे प्रमुख है। सामवेद को छान्दोग्योपनिषद् में सुन्दरता से गौरवान्वित किया गया है। सामवेद में संगीत का विशेष आनन्द भी जुड़ा हुआ है? क्योंकि साम मन्त्रों को सुन्दर राग? सुर और लय में गाया जाता है? जो इस बात के प्रमाण हैं कि संगीत की इस सुन्दर और शक्तिशाली कला को हमारे पूर्वजों ने इतना अधिक विकसित किया था। इस उपमा के सौन्दर्य के द्वारा हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण संगीत की आत्मा हैं? जैसे ऋग्वेद का सार सामवेद है।मैं देवों में इन्द्र हूँ  स्वर्ग के निवासी देवों का राजा वासव  इन्द्र है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि रहनसहन का सर्वोच्च स्तर स्वर्ग में है? परन्तु वहाँ भी देवताओं के पदों में श्रेष्ठता और हीनता का तारतम्य होता है। स्वर्ग की प्राप्ति इह लोक में किये गये पुण्य कर्मों के फलस्वरूप होती है और इस कारण जिस पुरुष ने यहाँ अधिक पुण्य अर्जित किया होगा? उसे वहाँ श्रेष्ठतर भोगों की प्राप्ति होगी। इस नियम के अनुसार? उन सब देवों के जीवन की अपेक्षा इन्द्र का जीवन अधिक वैभव? एवं विलासपूर्ण तथा शक्तिशाली और समर्थ होना स्वाभाविक है। देवताओं में इन्द्र मैं हूँ जो अन्य देवों का शासक और नियन्ता है? जिससे कि उनका जीवन सुखी एवं समृद्धशाली होता है।मैं इन्द्रियों में मन हूँ  आधिदैविक दृष्टि से जिसे इन्द्र कहते हैं? आध्यात्मिक दृष्टि से वही मन कहलाता है? क्योंकि देव शब्द का अर्थ इन्द्रिय होता है। जैसे इन्द्र देवताओं का राजा है? वैसे ही मन इन्द्रियों का राजा है। मन के बिना इन्द्रियाँ स्वतन्त्र रूप से अपना व्यापार नहीं कर सकती हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि मैं इन्द्रियों में मन हूँ। जगत् की समस्त सृष्ट वस्तुओं में सर्वाधिक श्रेष्ठ और अद्भुत वस्तु है बुद्धिमत्ता। यह एक ऐसी रहस्यमयी शक्ति है? जिसके विषय में आधुनिक वैज्ञानिक एक अस्पष्ट और काल्पनिक धारणा बनाने के अतिरिक्त कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके हैं।
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।10.22।।मन्त्रब्राह्मणसमुदायानामृगादीनां मध्ये सामवेदोऽस्मीति। ध्यानान्तरमुदाहरति -- वेदानामिति। संघाते जीवाधिष्ठिते यावत्पञ्चत्वं सर्वत्र व्यापिनी चैतन्याभिव्यञ्जिकेति शेषः।
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।10.22।।वासवः इन्द्रः। चेतना कार्यकरणसंघातेऽभिव्यक्ता बुद्धवृत्तिः।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।10.22।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।10.22।।सामवेदो गानेन रमणीयत्वात्। वासवो देवराजत्वात्। मन इन्द्रियान्तरप्रवर्तकत्वात्। चेतना धीवृत्तिः। चिदभिव्यक्तिहेतुत्वात्। एते वेदादीनां मध्ये श्रेष्ठाः।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।10.22।।वेदानाम् ऋग्यजुःसामाथर्वणां य उत्कृष्टः सामवेदः सः अहम् देवानाम् इन्द्रः अहम् अस्मि। एकादशानाम् इन्द्रियाणां यद् उत्कृष्टं मन इन्द्रियं तद् अहम् अस्मि। इयम् अपि न निर्धारणे -- भूतानां,चेतनावतां या चेतना सा अहम् अस्मि।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
।।10.22।।वेदानामिति। वासव इन्द्रः। भूतानां संबन्धिनी चेतना ज्ञानशक्तिरहमस्मि।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
 [10.22]सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन [10।32]वादः प्रवदतामहम् [10।32]अहमेवाक्षयः कालः [10।33]उद्भवश्च भविष्यताम् [10।34]द्यूतं छलयतामस्मि [10।36]तेजस्तेजस्विनामहम् [7।10]जयोऽस्मि व्यवसायो़ऽस्मि [10।36] इत्यादिषु निर्धारणाभावात् अतोऽत्र चन्द्रस्य नक्षत्रजातीयत्वाभावात् षष्ठ्यभिहितस्य सम्बन्धसामान्यस्य प्रमाणसिद्धविशेषे पर्यवसानमिति भावः।।।10.22।।गीतिर्हि सामशब्दार्थः तस्य वेदेषु निर्धारणं कथं इति शङ्काव्युदासायसामवेदोऽस्मि इति निर्देश इति प्रदर्शयतिऋग्यजुरिति। सामवेदस्योत्कर्षो गीतिप्रधानत्वसहस्रशाखत्वादिभिः अन्येषां तु तदभावात्तावन्मात्रेणापकर्षः न तु प्रामाण्यतारतम्यात्। ऋक् च वा इदमग्रे साम चास्तां सैव नाम ऋगासीदमो नाम साम स वा ऋक्सामो वावदन्मिथुनं सम्भवाव प्रजात्या इति नेत्यब्रवीत् साम ज्यायान्वा अतो मम महिमा [ऋ.ऐ.ब्रा.3।23] इति गीतिरूपस्य साम्नः प्राधान्याद्गीतात्मकस्य सामवेदस्य प्राधान्यम्। ऋग्भ्यो जातं वैश्यं वर्णमाहुः यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहुर्योर्नि सामवेदो ब्राह्मणानां प्रसूतिः [यजुःका3।9।50] इति च। देवा इति स्वर्गवासिनो विवक्षिताः ब्रह्मादिसङ्ग्रहायोगात्। वासवशब्दस्येन्द्रशब्देन व्याख्यानमतिशयद्योतनार्थम्?इदि परमैश्वर्ये [धा.पा.1।63] इति। इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः [कठो.3।10] एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च [मुं.उ.2।1।3] इत्यादिषु मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगभिधानात्कथंइन्द्रियाणां मनश्चास्मि इति निर्धारणमित्यत्राह -- एकादशेन्द्रियाणां यदुत्कृष्टं मन इन्द्रियमिति।अयमभिप्रायः -- इन्द्रियाणि दशैकं च [13।5]एकादशं मनश्चात्र [वि.पु.1।2।46] इत्यादिषु मनसोऽपीन्द्रियत्वेन व्यपदेशात्क्वाचित्कः पृथग्व्यपदेशो गोबलीवर्दन्यायादिति निर्धारणोपपत्तिः -- इति। नहि भूतेषु चेतनासंज्ञकं किञ्चिद्भूतमस्तीत्यभिप्रायेणाहइयमपीति षष्ठीति शेषः।तेजस्तेजस्विनां [7।1010।36]सत्त्वं सत्त्ववताम् [10।36] इत्यादिवद्विशिष्टे सारभूतविशेषणांशो विवक्षित इत्यभिप्रायेणचेतनावतामित्युक्तम्। ननु भूतानां षष्ठत्वेन चेतनासंज्ञं किमप्यन्यत्रोच्यते यथामहाभूतानि खं वायुरग्निरापस्तथा मही। षष्ठस्तु चेतनाधातुरात्मा सप्तम उच्यते। अष्टमं तु मनो ज्ञेयम् इति तथाषष्ठं वा चेतनाधातुर्मन इत्युपदिश्यते इति च। अत्र मनसोऽधिष्ठानतया चेतनायास्तदपृथग्वचनमित्यविरोधः। अतोभूतानामस्मि चेतना इति निर्धारणार्थत्वं युज्यत इति। मैवं? नहि भूतषष्ठनिर्देशमात्रान्महाभूतत्वम्? अन्यथापि सङ्ख्यानिवेशसम्भवात्? अत्र च सप्तमतया अष्टमतया च निर्दिष्टयोर्महाभूतत्वानभ्युपगमात्? चेतनाशब्दस्य च अप्रसिद्धार्थत्वात्? प्रसिद्धार्थस्वीकारस्योचित्यात्। अतस्सम्बन्धमात्रविवक्षयैव अत्र षष्ठी युक्तेति।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्।  अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति।  अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्।  यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः।  तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति।  उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति --   RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N  -- विचित्ररूपै  -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।10.22।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।10.22।।चतुर्णां वेदानां मध्ये गानमाधुर्येणातिरमणीयः सामवेदोऽहमस्मि। वासव इन्द्रः सर्वदेवाधिपतिः इन्द्रियाणामेकादशानां प्रवर्तकं मनः। भूतानां सर्वप्राणिसंबन्धिनां परिणामानां मध्ये चिदभिव्यञ्जिका बुद्धेर्वृत्तिश्चेतनाहमस्मि।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।10.22।।वेदानां चतुर्णामपि मध्ये सामवेदोऽस्मि। गानात्मकमाधुर्यरसवत्त्वेनाऽधिक्यं तत्रेति भावः। देवानां मध्ये वासव इन्द्रोऽस्मि? शतमखत्वेन सर्वक्रियांशभोक्तृत्वेन राज्यभोक्तृत्वेन च। इन्द्रियाणां आधिदैविकेन्द्रियरूपोऽस्मि। च पुनः सर्वप्रेरकत्वान्मनोऽस्मि। भूतानां चेतनानां चेतना ज्ञानशक्तिरस्मि।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
।।10.22।। --,वेदानां मध्ये सामवेदः अस्मि। देवानां रुद्रादित्यादीनां वासवः इन्द्रः अस्मि। इन्द्रियाणाम् एकादशानां चक्षुरादीनां मनश्च अस्मि संकल्पविकल्पात्मकं मनश्चास्मि। भूतानाम् अस्मि चेतना कार्यकरणसंघाते नित्याभिव्यक्ता बुद्धिवृत्तिः चेतना।।
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।10.22।।वेदानामिति। सामवेदोऽहं वेदानां मध्ये सामवेदोऽस्मि। देवानामहमिन्द्र इति यज्ञे गानमाधुर्येण भगवद्विभूतिराराध्या। इन्द्रियाणां एकादशानां मध्ये मनोऽहम्। नात्र निर्द्धारणे षष्ठी। प्रायःपदान्मनस्यपीद्रियत्वं निर्बाधम्।
### Swami Sivananda (english)
10.22 वेदानाम् among the Vedas? सामवेदः the Sama Veda? अस्मि (I) am? देवानाम् among the gods? अस्मि (I) am? वासवः Indra? इन्द्रियाणाम् among the senses? मनः mind? च and? अस्मि (I) am? भूतानाम् among living beings? अस्मि (I) am? चेतना intelligence.Commentary Vasava is Indra.Gods Such as Rudras? Adityas.Indriyas The five JnanaIndriyas or organs of knowledge? viz.? ear? skin? eye? tongue and nose and the five KarmaIndriyas or organs of action? viz.? speech? hands? feet? genitals and anus. The mind is regarded as the eleventh sense. As the senses cannot function without the help of the mind? the mind is regarded as the chief among the senses.Chetana Intelligence is that state of intellect which is manifest in the aggregate of the body and the senses.That which illumines all? from the intellect down to the grossest object? is called Chetana.

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### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 10.22 — Vibhooti Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/10/22. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 10.22 — Vibhooti Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/10/22

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