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title: "Bhagavad Gita 1.28 — Arjuna Visada Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:03:04.336Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/1/28"
license: "CC-BY-4.0"
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# Bhagavad Gita 1.28
> Chapter 1 — Arjuna Visada Yoga (Arjun Viṣhād Yog), Verse 28.

## Sanskrit
अर्जुन उवाच

कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।।1.28।।
 

## Transliteration
arjuna uvācha
dṛiṣhṭvemaṁ sva-janaṁ kṛiṣhṇa yuyutsuṁ samupasthitam


## Word Meanings
arjunaḥ uvācha—Arjun said; dṛiṣhṭvā—on seeing; imam—these; sva-janam—kinsmen; kṛiṣhṇa—Krishna; yuyutsum—eager to fight; samupasthitam—present; 


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।1.28 -- 1.30।। अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।
 
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।1.28 1.29।।अर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! युद्ध की इच्छा रखकर उपस्थित हुए इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हुये जाते हैं, मुख भी सूख रहा है और मेरे शरीर में कम्प तथा रोमांच हो रहा है।।


 
### Swami Adidevananda (english)
He was filled with deep compassion and said these words in despair:
### Swami Gambirananda (english)
Arjuna said, "O Krsna, seeing these relatives and friends who have assembled here with the intention of fighting, my limbs become languid and my mouth becomes completely dry."
### Swami Sivananda (english)
Arjuna said, "O Krishna, seeing my kinsmen arrayed here, eager to fight,
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
Shivers and goosebumps arise in my body; the Gandiva slips from my hand and my skin is burning all over.
### Shri Purohit Swami (english)
And his heart melted with pity, and sadly he spoke: "O my Lord! When I see all these, my own people, thirsting for battle,
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
অর্জুন উবাচ
কৃপযা পরযাবিষ্টো বিষীদন্নিদমব্রবীত্৷
দৃষ্ট্বেমং স্বজনং কৃষ্ণ যুযুত্সুং সমুপস্থিতম্৷৷1.28৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
অর্জুন বললেন, হে কৃষ্ণ! যুদ্ধাভিলাষী স্বজনদের একত্রে উপস্থিত দেখে আমার অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ অবসন্ন হচ্ছে এবং মুখ শুকিয়ে যাচ্ছে।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।1.28।। व्याख्या--'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्'--अर्जुनको  'कृष्ण' नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें नौ बार आया है। भगवान् श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवान्को अर्जुनका  'पार्थ'  नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान् और अर्जुन आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे सञ्जयने गीताके अन्तमें  'कृष्ण' और 'पार्थ'  नामका उल्लेख किया है  'यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः'  (18। 78)।
धृतराष्ट्रने पहले 'समवेता युयुत्सवः'  कहा था और यहाँ अर्जुनने भी  'युयुत्सुं समुपस्थितम्' कहा है; परन्तु दोनोंकी दृष्टियोंमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके पुत्र हैं--ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ  'मामकाः' और  'पाण्डवाः'  कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं है, अतः अर्जुनने यहाँ 'स्वजनम्' कहा है, जिसमें दोनों पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर वह है तो हमारा ही कुटुम्बी।
अबतक 'दृष्ट्वा' पद तीन बार आया है  'दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्' (1। 2) 'व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्' (1। 20) और यहाँ 'दृष्ट्वेमं स्वजनम्' (1। 28)। इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना तो एक तरहका ही रहा अर्थात् दुर्योधनका तो युद्धका ही एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है।
 'सीदन्ति मम गात्राणि ৷৷. भ्रमतीव च मे मनः'--  अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख आदि एक-एक अङ्ग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख सूखता जा रहा है। जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े हो रहे हैं अर्थात् सारा शरीर रोमाञ्चित हो रहा है! जिस गाण्डीव धनुषकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारसे शत्रु भयभीत हो जाते हैं वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! त्वचामें--सारे शरीरमें जलन हो रही है  (टिप्पणी प0 22.1) । मेरा मन भ्रमित हो रहा है अर्थात् मेरेको क्या करना चाहिये--यह भी नहीं सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं असमर्थ हो रहा हूँ! ऐसा लगता है कि मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ूँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक पाप मालूम दे रहा है।
 सम्बन्ध--  पूर्वश्लोकमें अपने शरीरके शोकजनित आठ चिह्नोंका वर्णन करके अब अर्जुन भावी परिणामके सूचक शकुनोंकी दृष्टिसे युद्ध करनेका अनौचित्य बताते हैं।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।1.28।। मनसंभ्रम के कारण मानसिक रोगी के शरीर में उत्पन्न होने वाले लक्षणों को यहाँ विस्तार से बताया गया है। जिसे संजय ने करुणा कहा थाउसकी वास्तविकता स्वयं अर्जुन के शब्दों से स्पष्ट ज्ञात होती है। वह कहता है इन स्वजनों को देखकर . मेरे अंग कांपते हैं. इत्यादि।आधुनिक मनोविज्ञान में एक व्याकुल असन्तुलित रोगी व्यक्ति के उपर्युक्त लक्षणों वाले रोग का नाम चिन्ताजनित नैराश्य की स्थिति दिया गया है।
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।1.28।।तदेवेदंशब्दवाच्यं वचनमुदाहरति   दृष्ट्वेति।  आत्मीयं बन्धुवर्गं युद्धेच्छया युद्धभूमावुपस्थितमुपलभ्य शोकप्रवृत्तिं दर्शयति   सीदन्तीति।  देवांशस्यैवार्जुनस्यानात्मविदः स्वपरदेहेष्वात्मानात्मीयाभिमानवतस्तत्प्रियस्य युद्धारम्भे तन्मृत्युप्रसङ्गदर्शिनः शोको महानासीदित्यर्थः।
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।1.28।।परया कृपया स्नेहजन्यकरुणयाविष्टो व्याप्तः सन्नहो एते पित्रादयो बन्धवों मरिष्यन्तीति विषादमुपतापं कूर्वन्निदं वक्ष्यमाणमब्रवीदुक्तवानित्यर्थः। तदेवेदंशब्दवाच्यं वचनमुदाहरति   दृष्ट्वेति।  इमं प्रत्यक्षेणोपलभ्यमानं स्वजनं स्वसंबन्धिवर्गं युयुत्सुं युद्धेच्छुं समुपस्थितं सभ्यग्युद्धभूमावुपस्थितं नतु साधारणयुयुत्सया साधारणमागतं दृष्ट्वोपलभ्य सीदन्तीति परेणान्वयः। 
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।1.28।।Sri  Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।1.28।।कृपया स्नेहेन। स च स्वजनमिति विशेषणेन प्रदर्श्यते।
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।1.28।।अर्जुन उवाच  संजय उवाच  स तु पार्थो महामनाः परमकारुणिको दीर्घबन्धुः परमधार्मिकः सभ्रातृको भवद्भिः अतिघोरैः मारणैः जतुगृहादिभिः असकृद् वञ्चितः अपि परमपुरुषसहायः अपि हनिष्यमाणान् भवदीयान् विलोक्य बन्धुस्नेहेन परमया च कृपया धर्माधर्मभयेन च अतिमात्रस्विन्नसर्वगात्रः सर्वथा अहं न योत्स्यामि इति उक्त्वा बन्धुविश्लेषजनितशोकसंविग्नमानसः सशरं चापं विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत्।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
 ।।1.28।।  किमब्रवीदित्यपेक्षायामाह   दृष्ट्वेममित्यादि  यावदध्यायसमाप्ति। हे कृष्ण योद्धुमिच्छन्तं पुरतः सम्यगवस्थितमिमं बन्धुजनं दृष्ट्वा मदीयानि गात्राणि करचरणादीनि सीदन्ति विशीर्यन्ते। किंच मुखं परि समंताच्छुष्यति निर्द्रवीभवति।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
।। 1.28।।अथाध्यायशेषस्य सङ्कलितार्थमाह  स त्विति। तुशब्देन पूर्वोक्तप्रकाराद्दुर्योधनात् वक्ष्यमाणप्रकारविशिष्टस्य पार्थस्य विशेषंस कौन्तेयः इत्यनेनाभिप्रेतं द्योतयति। बन्धुव्यपदेशमात्रयोग्यशत्रुवधानिच्छया विजयादिकं त्रैलोक्यराज्यावधिकमपि तृणाय मन्यत इतिमहामना इत्युक्तम्।न काङ्क्षे विजयम् 1।31 इत्यादिकं हि वदति। शत्रूणामप्यसौ दुःखं न सहत इतिपरमकारुणिकत्वोक्तिःकृपया परयाऽऽविष्टः इति ह्युक्तम्।पितृ़नथ पितामहान्आचार्याः पितरः पुत्राः 1।34 इत्याद्युक्तस्नेहविषयप्राचुर्यंदीर्घबन्धुशब्देनोक्तम् यद्वा बन्धुना महापकारे कृतेऽपि स्वयं न शिथिलबन्धो भवतीति भावः।सर्वान्बन्धून्स्वजनं हि 1।37 इत्यादिकमिह भाव्यम्। आततायिपक्षस्थानामप्याचार्यादीनां अहन्तव्यत्वानुसन्धानात् कुलक्षयादिजनिताधर्मपारम्पर्यदर्शनाच्चपरमधार्मिक इत्युक्तिः। आततायिवधानुज्ञानमाचार्यादिव्यतिरिक्तविषयम् इत्यर्जुनस्य भावः।सभ्रातृक इति  नायमेक एवैवंविधः किन्तु सर्वेऽपि पाण्डवा इति भावः। एतेनअस्मान्नःवयम्अस्माभिः इत्यादिभिरुक्तं संगृहीतम्। यद्वा न केवलं स्वापकारमात्रानादरादेष बन्धुवधादिकमुपेक्षते अपितु आसन्नतराचार्यादिस्थानीयबहुमतिस्नेहदयादिविषयधर्मराजद्रौपद्याद्यपकारेऽपीति भावः। आचार्यादिवधदोषो भ्रातृ़णामपि मा भूदित्यर्जुनाभिप्रायः। हन्तव्यत्वसूचनायघ्नतोऽपि 1।35 इत्युक्तम्। तद्विवृणोति  भवद्भिरित्यादिना।जतुगृहदाहादिभिरित्यादिना आततायिशब्दोऽपि व्याख्यातः।अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदारहरश्चैव षडेते ह्याततायिनः।। मनुः 8।350.क्षे.23आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन मनुः8।351 इति हि स्मरन्ति। आदिशब्देनासकृच्छब्देन चाततायित्वहेतवः प्रत्येकं बहुशः कृताः न चेदानीमप्युपरतमिति दर्शितम्। अनुपरतिश्चघ्नतोऽपि 1।1।14 इति वर्तमाननिर्देशेन सूचिता।भवद्भिरित्यनेन धृतराष्ट्रमपिमुह्यन्तमनुमुह्यामि दुर्योधनममर्षणम् म.भा.1।1।145 इति पुत्रस्नेहवशादनुमन्तारं तत्तुल्यं व्यपदिशति। एवं च दुर्योधनादीनां सर्वेषामप्यतिलोभोपहतचेतस्त्वादिना महामना इत्युक्तविपरीतत्वमुक्तं भवति। शकुनिकर्णादिसहायानां धार्तराष्ट्रादीनां हनिष्यमाणानामपि हतत्वनिश्चयेन शोकोत्पत्त्यर्थमुक्तंपरमपुरुषेति। परमपुरुषः सहायो यस्येति विग्रहः परमपुरुषस्य सहायो निमित्तमात्रमिति वा। वक्ष्यति हि  मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् 11।33 इति अर्जुनश्च पूर्वं महाबलसहस्रेभ्योऽपि निरायुधस्य परमपुरुषस्य सन्निधिमात्रमेव विजयहेतुतया निश्चित्य तमेव वव्रे। स्नेहाद्यस्थानत्वसूचनायभवदीयान्विलोक्येत्युक्तम्।बन्धुस्नेहेनेत्यादि  न ह्यसौ दुर्योधनवत् बन्धुद्वेषनृशंसत्वप्रतिभटभयादिना विषण्णः नापि परेषां गुणान्निवर्तते न च परमपुरुषसचिवस्य स्वस्य दौर्बल्यादिति भावः।सीदन्ति 1।28 इत्यादेःमनः 1।30 इत्यन्तस्यार्थः अतिमात्रेत्यादिना संगृहीतः। सखीन् वयस्यान्। सुहृदः वयोविशेषानपेक्षया हितैषिणः।सेनयोरुभयोरपि एकै स्यां सेनायामेते सर्वे प्रायशो विद्यन्त इति भावः। समीक्ष्य शास्त्रलोकयात्रायुक्तमवलोक्येत्यर्थः।सर्वान्बन्धून् न ह्यत्रानागतः कश्चिद्बन्धुरवशिष्यत इति भावः।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।1.28।।No commentary.
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।1.28।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।1.28।।तदेव भगवन्तं प्रत्यर्जुनवाक्यमवतारयति संजयःअर्जुन उवाचेत्यादिनाएवमुक्त्वार्जुनः संख्ये इत्यतः प्राक्तनेन ग्रन्थेन। तत्र स्वधर्मप्रवृक्तिकारणीभूततत्त्वज्ञानप्रतिबन्धकः स्वपरदेहे आत्मात्मीयाभिभानवतोऽनात्मविदोऽर्जुनस्य युद्धेन स्वपरदेहविनाशप्रसङ्गदर्शिनः शोको महानासीदति तल्लिङ्गकथनेन दर्शयति त्रिभिः श्लोकैः। इमं स्वजनमात्मीयं बन्धुवर्गं युद्धेच्छुं युद्धभूमौ चोपस्थितं दृष्ट्वा स्थितस्य मम। पश्यतो ममेत्यर्थः। अङ्गानि व्यथन्ते मुखं च परिशुष्यतीति श्रमादिनिमित्तशोकापेक्षयातिशयकथनाय सर्वतोभाववाचिपरिशब्दप्रयोगः।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।1.28।।तथाभूतोऽर्जुनो वाक्यान्याह  दृष्ट्वेममिति। हे कृष्ण इमं युयुत्सुं योद्धुकामं समुपस्थितं सम्यक्प्रकारेणोपस्थितमनिवर्तिनं स्वजनं दृष्ट्वा मम गात्राणि सर्वाङ्गानि सीदन्ति विशीर्यन्ते मुखं च परितः बाह्याभ्यन्तरभेदेनेत्यर्थः।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
1.28 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10. 
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।1.28  1.30।।सीदन्ति इत्युपक्रम्यभ्रमतीव च मे मनः इत्यन्तं देहधर्माभिमानेन विषयदर्शनपूर्वकं स्वस्याश्रयो निवेदयतिनिमित्तानि इत्यादिना।
### Swami Sivananda (english)
1.28 दृष्ट्वा having seen? इमम् these? स्वजनम् kinsmen? कृष्ण O Krishna (the dark one? He who attracts)? युयुत्सुम् eager to fight? समुपस्थितम् arrayed.No Commentary.

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### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 1.28 — Arjuna Visada Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/1/28. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 1.28 — Arjuna Visada Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/1/28

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*This content is provided in research-grade Markdown format. Required Attribution: Cite as Rantideb Howlader (2026).*
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