---
title: "Bhagavad Gita 1.13 — Arjuna Visada Yoga"
author: "Rantideb Howlader"
date: "2026-06-11T14:04:51.866Z"
canonical_url: "https://www.ranti.dev/gita/1/13"
license: "CC-BY-4.0"
---

# Bhagavad Gita 1.13
> Chapter 1 — Arjuna Visada Yoga (Arjun Viṣhād Yog), Verse 13.

## Sanskrit
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।

सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।1.13।।
 

## Transliteration
tataḥ śhaṅkhāśhcha bheryaśhcha paṇavānaka-gomukhāḥ
sahasaivābhyahanyanta sa śhabdastumulo ’bhavat


## Word Meanings
tataḥ—thereafter; śhaṅkhāḥ—conches; cha—and; bheryaḥ—bugles; cha—and; paṇava-ānaka—drums and kettledrums; go-mukhāḥ—trumpets; sahasā—suddenly; eva—indeed; abhyahanyanta—blared forth; saḥ—that; śhabdaḥ—sound; tumulaḥ—overwhelming; abhavat—was


## Translations
### Swami Ramsukhdas (hindi)
।।1.13।। उसके बाद शंख, भेरी (नगाड़े), ढोल, मृदङ्ग और नरसिंघे बाजे एक साथ बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
 
### Swami Tejomayananda (hindi)
।।1.13।।तत्पश्चात् शंख, नगारे, ढोल व शृंगी आदि वाद्य एक साथ ही बज उठे, जिनका बड़ा भयंकर शब्द हुआ।


 
### Swami Adidevananda (english)
Then suddenly conchs, kettle drums, trumpets, tabors, and blow horns blared forth, and the sound was terrific.
### Swami Gambirananda (english)
Just immediately afterward, conch shells, kettledrums, tabors, trumpets, and cow-horns blared forth, creating a tumultuous sound.
### Swami Sivananda (english)
Then, suddenly, conches, kettledrums, tabors, drums, and cow horns blared forth from the Kaurava side, and the sound was tremendous.
### Dr. S. Sankaranarayan (english)
Then, all of a sudden, the conch-shells, drums, tambourines, trumpets, and cow-horns sounded in unison; the sound was tumultuous.
### Shri Purohit Swami (english)
And immediately, all the conches, drums, trumpets, and horns blared forth in a tumultuous uproar.
### স্বামী ব্রহ্মানন্দ (মূল শ্লোক) (bengali)
ততঃ শঙ্খাশ্চ ভের্যশ্চ পণবানকগোমুখাঃ৷
সহসৈবাভ্যহন্যন্ত স শব্দস্তুমুলোভবত্৷৷1.13৷৷
### সব্যসাচী বৈরাগী (অনুবাদ) (bengali)
তারপর শঙ্খ, ভেরী, পণ, বন, গোমুখ প্রভৃতি বাদ্য একত্রে ধ্বনিত হয়ে এক তুমুল শব্দের সৃষ্টি হয়েছিল।

## Commentaries
### Swami Ramsukhdas (hindi)
 1.13।। व्याख्या--'ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानक-गोमुखाः'-- यद्यपि भीष्मजीने युद्धारम्भकी घोषणा करनेके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था,तथापि कौरवसेनाने भीष्मजीके शंखवादनको युद्धकी घोषणा ही समझा। अतः भीष्मजीके शंख बजानेपर कौरवसेनाके शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।
 'शंख' समुद्रसे उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुरजीकी सेवापूजामें रखे जाते हैं और आरती उतारने आदिके काममें आते हैं। माङ्गलिक कार्योंमें तथा युद्धके आरम्भमें ये मुखसे फूँक देकर बजाये जाते हैं। 'भेरी' नाम नगाड़ोंका है (जो बड़े नगाड़े होते हैं उनको नौबत कहते हैं)। ये नगाड़े लोहेके बने हुए और भैंसेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। ये मन्दिरोंमें एवं राजाओंके किलोंमें रखे जाते हैं। उत्सव और माङ्गलिक कार्योंमें ये विशेषतासे बजाये जाते हैं। राजाओंके यहाँ ये रोज बजाये जाते हैं।'पणव' नाम ढोलका है। ये लोहेके अथवा लकड़ीके बने हुए और बकरेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे या लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। ये आकारमें ढोलकीकी तरह होनेपर भी ढोलकीसे बड़े होते हैं। कार्यके आरम्भमें पणवोंको बजाना गणेशजीके पूजनके समान माङ्गलिक माना जाता है। 'आनक'  नाम मृदङ्गका है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकारमें ये लकड़ीकी बनायी हुई ढोलकीके समान होते हैं। ये मिट्टीके बने हुए और चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे बजाये जाते हैं। 'गोमुख' नाम नरसिंघेका है। ये आकारमें साँपकी तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गायकी तरह होता है। ये मुखकी फूँकसे बजाये जाते हैं।
### Swami Chinmayananda (hindi)
।।1.13।। निसंदेह सभी योद्धागण अत्यधिक तनाव में थे परन्तु जैसे ही उन्होंने शंखनाद सुना सबने अपनाअपना शंख उठाकर शंखध्वनि की। उसके बाद युद्ध के वाद्य शंख भेरी नगाड़े आदि युद्ध की घोषणा के रूप में बजने लगे। संजय इस कोलाहल का वर्णन तुमुलध्वनि हुई इस प्रकार करता है। परन्तु आगे प्रत्युत्तर में हुई पाण्डवों की शंखध्वनि का वर्णन करते हुए कहता है कि वह शब्द इतना भयंकर था कि आकाश और पृथ्वी उससे गूँजने लगे और कौरवों के हृदय विदीर्ण होने लगे। इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि संजय दुर्योधन के इस कार्य का विरोधी था। अत हम पूर्ण विश्वास के साथ उसके द्वारा वर्णित युद्धभूमि में दिये गये भगवान् श्रीकृष्ण के उपदेश को स्वीकार कर सकते हैं।
### Sri Anandgiri (sanskrit)
।।1.13।।राजाभिप्रायं प्रतीत्य भीष्मप्रवृत्त्यनन्तरं तत्पक्षैस्तैस्तै राजभिः शङ्खादयो वाद्यविशेषा झटिति शब्दवन्तः संपादिताः। स च शङ्खादिप्रयुक्तशब्दस्तुमुलो बहुलं भयं परेषां परिद्योतयन्नासीदित्याह   तत इति। 
### Sri Dhanpati (sanskrit)
।।1.13।। तत इति।  दुर्योधनाभिप्रायानुरोधिभीष्मप्रवृत्त्यनन्तरं शङ्खादयो वाद्यविशेषा भीष्मानुसारिभिः सहसैव झटित्यभ्यहन्यन्ताभिहता वादिताः। स शब्दस्तुमुलो महाञ्जातः।
### Sri Madhavacharya (sanskrit)
।।1.13।।Sri Madhvacharya  did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
### Sri Neelkanth (sanskrit)
।।1.13।।अभ्यहन्यन्त अभिहताः। कर्मकर्तरि प्रयोगः। 
### Sri Ramanujacharya (sanskrit)
।।1.13।।धृतराष्ट्र उवाच  सञ्जय उवाच  दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्तताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्तताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् आलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्यदेवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिरवृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् पृथक् पृथक् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधनप्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एव नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्त्तराष्ट्रा मेनिरे। एवं तद्विजयाभिकाङ्क्षिणे धृतराष्ट्राय संजयः अकथयत्।अथ युयुत्सून् अवस्थितान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणप्रमुखान् दृष्ट्वा लङ्कादहनवानरध्वजः पाण्डुतनयो ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधिं स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलं हृषीकेशं परावरनिखिलजनान्तर्बाह्यसर्वकरणानां सर्वप्रकारकनियमने अवस्थितं समाश्रितवात्सल्यविवशतया स्वसारथ्ये अवस्थितं युयुत्सून् यथावत् अवेक्षितुं तदीक्षणक्षमे स्थाने रथं स्थापय इति अचोदयत्।
### Sri Sridhara Swami (sanskrit)
 ।।1.13।।  तदेवं सेनापतेर्भीष्मस्य युद्धोत्सवमालक्ष्य सर्वतो युद्धोत्सवः प्रवृत्त इत्याह   तत इति।  पणवा आनकाः गोमुखाश्च वाद्यविशेषाः। सहसैव तत्क्षणमेवाभ्यहन्यन्त वादिताः। स च शङ्खादिशब्दस्तुमुलो महानभवत्।
### Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha (sanskrit)
।।1.13।।तस्य सञ्जनयन् इत्यादेःतुमुलोऽभवत् इत्यन्तस्यार्थमाह  तस्येति। जनयन्निति शतुःलक्षणहेत्वोः क्रियायाः अष्टा.3।2।126 इति हेत्वर्थत्वसूचनायजनयितुं इत्युक्तम्।सिंहनादं विनद्य इत्येतत्ओदनपाकं पचति इतिवदिति सूचयितुंकृत्वा इति पदम्।कृभ्वस्तयः क्रियासामान्यवचनाः इत्येतद्व्यञ्जनायोदाहरणतयाशङ्खाध्मानं च कृत्वा इत्युक्तम्।ततः शङ्खाः इत्यत्र ततःशब्देन विजिगीषासूचनाय भीष्मेण सेनापतिना कारितत्वं ज्ञापितमित्यभिप्रायेणोक्तंअकारयदिति।शङ्खभेरीति पणवाद्युपलक्षणम् ततः श्लोकेऽपि कतिपयवाद्यविशेषनिर्देश उपलक्षणार्थ इति सूचितम्। सिंहनादशङ्खध्मानाभ्यां शङ्खभेर्यादिनादसमुच्चयार्थो द्वितीयश्चकारः। कृत्वेत्यनेन अकारयदित्यस्य समुच्चयार्थस्तृतीयः।
### Sri Abhinavgupta (sanskrit)
।।1.13।।No commentary.
### Sri Jayatritha (sanskrit)
।।1.13।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.
### Sri Madhusudan Saraswati (sanskrit)
।।1.13।।ततो भीष्मस्य सेनापतेः प्रवृत्त्यनन्तरं पणवा आनका गोमुखाश्च वाद्यविशेषाः सहसा तत्क्षणमेवाभ्यहन्यन्त वादिताः। कर्मकर्तरि प्रयोगः।  स शब्दस्तुमुलो महानासीत्तथापि न पाण्डवानां क्षोभो जात इत्यभिप्रायः।
### Sri Purushottamji (sanskrit)
।।1.13।।एवं सेनापतेर्युद्धोत्सवप्रवर्त्तकं शङ्खध्वनिमाकर्ण्य सर्वसावधानकरणार्थं वादका दुन्दुभ्यादिवादनं कृतवन्त इत्याह  तत इति। सहसा तच्छ्रवण एव शङ्खा भेर्यश्च पणवा आनकाः गोमुखाः अभ्यहन्यन्त वादिता इत्यर्थः। एवकारेण तच्छ्रवणादेव वादितवन्तः नतु युद्धोपस्थित्या स्वशौर्याविर्भावनेति व्यज्यते। स शङ्खादिशब्दस्तुमुलो महानासीत्।
### Sri Shankaracharya (sanskrit)
1.13 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10. 
### Sri Vallabhacharya (sanskrit)
।।1.12  1.13।।ततस्तद्विषादमवलोक्य भीष्मस्तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खनादं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैर्विजयाभिशंसकं घोषं चाकारयत्।
### Swami Sivananda (english)
1.13 ततः then शङ्खाः conches? च and? भेर्यः kettledrums? च and? पणवानकगोमुखाः tabors? drums and cowhorns? सहसा एव ite suddenly? अभ्यहन्यन्त blared forth? सः that? शब्दः sound? तुमुलः tremendous? अभवत् was.No Commentary.

---

<!-- METADATA_START -->
## Metadata & Citations

### Further Reading

### Navigation
- [Back to Bio Hub](https://www.ranti.dev/.md)
- [Full Site Manifest](https://www.ranti.dev/llms.txt)

```json
{
  "@context": "https://schema.org",
  "@type": "TechArticle",
  "headline": "Bhagavad Gita 1.13 — Arjuna Visada Yoga",
  "author": {
    "@type": "Person",
    "name": "Rantideb Howlader"
  },
  "datePublished": "2026-06-11T14:04:51.866Z",
  "url": "https://www.ranti.dev/gita/1/13",
  "license": "https://creativecommons.org/licenses/by/4.0/",
  "isAccessibleForFree": true
}
```

### BibTeX
```bibtex
@article{gita-1-13_2026,
  author = {Rantideb Howlader},
  title = {Bhagavad Gita 1.13 — Arjuna Visada Yoga},
  journal = {Rantideb Howlader Portfolio},
  year = {2026},
  url = {https://www.ranti.dev/gita/1/13},
  note = {Accessed: 2026-06-11}
}
```

### IEEE
Rantideb Howlader, "Bhagavad Gita 1.13 — Arjuna Visada Yoga," Rantideb Howlader Portfolio, 2026. [Online]. Available: https://www.ranti.dev/gita/1/13. [Accessed: 2026-06-11].

### APA
Rantideb Howlader. (2026). Bhagavad Gita 1.13 — Arjuna Visada Yoga. Rantideb Howlader. Retrieved from https://www.ranti.dev/gita/1/13

--- 
*This content is provided in research-grade Markdown format. Required Attribution: Cite as Rantideb Howlader (2026).*
<!-- METADATA_END -->